हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है अपांग जिसका अर्थ है - आंख का कोना; तिरछी नज़र। कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है।
दया भी करोगे? दया-धाम हो,
रमो चित्त में आप तो राम हो।
हमें शक्ति दो, भुक्ति दो या न दो,
विभो! भक्ति दो, मुक्ति दो या न दो॥
गुणातीत हो, या निराकार हो,
हमारे लिए तो तुम्हीं सार हो।
सभी ठौर हो सृष्टि मे जो हरे!
पुन: दृष्टि से हो कहो, क्यों परे?
तजो शून्यता और साकार हो,
पुन: रूप में भाव-विस्तार हो।
बनें चर्म के चक्षु भी धन्य ये,
तुम्हें छोड़ देखें किसे अन्य ये॥
कई जन्म का हाय! विश्लेष है।
कहो, क्या अभी और भी शेष है?
नहीं किंतु चिंता कि न्यारे रहें;
तुम्हारा सदा ध्यान धारे रहें॥
व्यथा हो न जो भूमि को भार की,
नहीं है हमें भीति संसार की।
तुम्हारे जगद्राज्य में भीति क्या?
हमारे लिए है नई नीति क्या?
तुम्हारा जगद्राज्य जीता रहे,
सदा प्रेम-पीयूष पीता रहे।
बढ़े शांति ज्यों चंद्रमा की कला,
सभी के भले में हमारा भला॥
हमें ध्यान दो, ज्ञान दो या न दो,
गिरा-गान दो, मान दो या न दो।
तुम्हारे गुण-ग्राम गाया करें;
इसी भाँति विश्राम पाया करें॥
नहीं लालसा है विभो! वित्त की,
हमें चेतना चाहिए चित्त की।
भले ही न दो एक भी संपदा,
रहे आत्म-विश्वास पूरा सदा॥
नहीं माँगते हीर या हेम दो,
दिया विश्व तो विश्व का प्रेम दो।
सहें दु:ख आपत्तियों से घिरे,
रहें किंतु दुर्वृत्तियों से फिरे॥
न छूटें भले ही कभी बंध से,
फिरें मोह के मार्ग में अंध से।
न भूलें तुम्हारी निराली छटा,
घिरी ही रहे नित्य काली घटा॥
रहें सर्वदा दु:ख में, सोच क्या?
तुम्हारा दिया दु:ख, संकोच क्या?
नहीं मृत्यु से किंतु जी में डरें,
तुम्हें देखते-देखते ही मरें॥
भिखारी खड़े हैं, ज़रा ध्यान दो,
न दो और तो दृष्टि का दान दो।
मरें या जिएँ भाग्य को लेख लें,
तुम्हारी अपांग-प्रभा देख लें॥
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