आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥
भावार्थ:- जिस घर में जाने पर घर वाले देखते ही प्रसन्न न हों और जिनकी आँखों में प्रेम न हो, उस घर में कभी न जाना चाहिए। उस घर से चाहे कितना ही लाभ क्यों न हो वहाँ कभी नहीं जाना चाहिए।
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दुर्जन दर्पण सम सदा, करि देखौ हिय गौर।
संमुख की गति और है, विमुख भए पर और॥
भावार्थ:- दुर्जन शीशे के समान होते हैं, इस बात को ध्यान से देख लो, क्योंकि दोनों ही जब सामने होते हैं तब तो और होते हैं और जब पीठ पीछे होते हैं तब कुछ और हो जाते हैं। भाव यह है कि दुष्ट पुरुष सामने तो मनुष्य की प्रशंसा करता है और पीठ पीछे निंदा करता है, इसी प्रकार शीशा भी जब सामने होता है तो वह मनुष्य के मुख को प्रतिबिंबित करता है; पर जब वह पीठ पीछे होता है तो प्रतिबिंबित नहीं करता।
‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान।
पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥
भावार्थ;- गोस्वामी जी कहते हैं कि शरीर मानो खेत है, मन मानो किसान है। जिसमें यह किसान पाप और पुण्य रूपी दो प्रकार के बीजों को बोता है। जैसे बीज बोएगा वैसे ही इसे अंत में फल काटने को मिलेंगे। भाव यह है कि यदि मनुष्य शुभ कर्म करेगा तो उसे शुभ फल मिलेंगे और यदि पाप कर्म करेगा तो उसका फल भी बुरा ही मिलेगा।
सूर समर करनी करहीं, कहि न जनावहिं आप।
विद्यमान रिपु पाइ रन, कायर करहिं प्रलाप॥
भावार्थ;- शूरवीर युद्ध में काम करके दिखाते हैं, मुँह से बातें बना कर अपनी बड़ाई नहीं करते। इसके विपरीत कायर पुरुष युद्ध में शत्रु को सामने देखकर बकवाद करने लगते हैं। भाव यह है कि वीर पुरुष काम करके दिखाते हैं, बातें नहीं बनाते और नीच पुरुष बातें तो बढ़कर बनाते हैं पर काम के समय भाग जाते हैं।
‘तुलसी’ कबहुँ न त्यागिए, अपने कुल की रीति।
लायक ही सों कीजिए, ब्याह, बैर अरु प्रीति॥
भावार्थ;- तुलसीदास कहते हैं कि अपने कुल की रीति को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। वैर, विवाह और प्रीति अपने समान व्यक्तियों से ही करना चाहिए।
सिष्य सखा सेवक सचिव, सुतिय सिखाबनु साँच।
सुनि करिए पुनि परिहरिय, पर मनरंजन पाँच॥
भावार्थ;- शिष्य, मित्र, सेवक, मंत्री और स्त्री यदि इनकी कोई शिक्षा सच्ची हो और हितकारक हो तो उस पर आचरण करना चाहिए; नहीं तो दूसरों के मन को प्रसन्न करने के लिए कही गई इन पाँचों की बातों को छोड़ देना चाहिए।