विज्ञापन

कबीर के 5 चुनिंदा दोहे, जिनमें छिपा है जीवन का सार

काव्य डेस्क

Sahitya
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस 
टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास ।।


भावार्थ:-
कबीर कहते हैं कि इस जवानी कि आशा में पड़कर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि दस दिनों में फूलों से पलाश लद जाता है, फिर फूल झड़ जाने पर वह उखड़ जाता है, वैसे ही जवानी को समझो।
 
विज्ञापन

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध
कबीर संगत साधु की, कटै कोटि अपराध।।


भावार्थ:-
एक पल आधा पल या आधे का भी आधा पल ही संतों की संगत करने से मन के करोड़ों दोष मिट जाते हैं।।

ऊँचे कुल की जनमिया, करनी ऊँच न होय
कनक कलश मद सों भरा, साधु निन्दा कोय।।

भावार्थ:-
जैसे किसी का आचरण ऊँचे कुल में जन्म लेने से,ऊँचा नहीं हो जाता। इसी तरह सोने का घड़ा यदि मदिरा से भरा है, तो वह महापुरषों द्वारा निन्दित ही है।

कबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय।
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय।। 

भावार्थ:-
कबीर कहते हैं कि विषधर तो बहुत मिलते हैं, मणिधर नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाये, तो विष मिटकर अमृत हो जाता है। 

एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःखराखि है। 
एक शब्द बन्धन कटे, एक शब्द गल फंसि।। 

भावार्थ:-
समता के शब्द सुख की खान हैं, और विषमता के शब्द दुखों की ढेरी हैं। निर्णय के शब्दों से विषय - बन्धन कटते हैं, और मोह - माया के शब्द गले की फांसी हो जाते हैं।

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12479 कविताएं

View Profile

Ramesh Raj

25 कविताएं

View Profile