आर्यावर्त की धरा
है नारी से सजी सदा
आदि शक्ति रूप तू ही
तू ही तो ऋतंभरा
हर विधा की देवी तू है
नवरसों की पात्रता
सीता जैसी पावन है
तू द्रौपदी सी प्रज्वला
रौद्र रूप काली का जो
शांत शिव ही कर सके
महिषासुर को हरने वाली
संग है तो क्यों डरे
प्राण सत्यवान के जो
छीन लाये यम से भी
देख वन में जात राम
मन करे तू दृढ़ तभी
प्यार माँ का जो मिले
ना पूर्ण वो लगे कभी
भाग्य में थे कान्हा के
यशोदा और देवकी
बात प्रेम छिड़े तो
राधा की कहानी हो
जोगी कोई बन सके तो
मीरा सी दीवानी हो
काल चक्र की घड़ी
ना रुकती है यहाँ कभी
चार युगों की कथा में
पात्र तेरे हैं सभी
कार्य ऐसा ना कोई
की तू जिसे ना कर सके
मंदबुद्धि हो चला वो
अबला जो तुझे कहे
तुझसे ही ये सृष्टि की
है सभ्यता बनी हुई
नमन ऐसी शक्ति को
जो तुझमें है बसी हुई….
नमन ऐसी शक्ति को
जो तुझमें है बसी हुई….।।