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स्वयं को समझाया जाये

NIRMALA NAIR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलिए जरा, बात को सुलझाया जाये
        
                                                    
                            
शोर शराबे के, माहौल से निकला जाये

अनगिनत परेशानी है, देखें घरों में अपने
पहले अपने ही, गुलिस्ताँ को सजाया जाये

एक दूजे को, देकर अहमियत थोड़ी
रिश्तों में लगी गांठ को खुलवाया जाये

'मैं' से थोडा डर के, चलने की जरूरत है अभी
'हम' की मुट्ठी में जुड़, संग संग मुस्काया जाये

धरा की व्यथा को, महसूस अब करना होगा
माता की गोद को, जरा नेह से सहलाया जाये

क्यों रौंदे हम ,अपने ही पैरों से बगीचा अपना
यही बात अपने आपको भी समझाया जाये

अहंकार ना आये, यह सोच सचेते 'निर्मल'
फिर औरों मिल कर, स्नेह से मनाया जाये

-निर्मला सुरेंद्रन
2 वर्ष पहले
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