[यह लेख अविनाश त्रिपाठी ने लिखा है]
शीरी ज़बान, इल्म, शराफ़त. परदानशीन हुस्न,और अदब का सबसे बड़ा मरकज़ लखनऊ शायद अपने अदबी मकाम के पूरे उरूज़ पर था कि इसी मोहब्बत के शहर से कुछ दूर बाराबंकी की रूदौली रियासत में एक अदब और मोहब्बत का सही मायनो में पैरोकार अंगड़ाई ले रहा था। यह वो वक़्त था जब सुबह की धूप में नर्मी हो चली थी, अलसुबह सैर करने में दोशाला ओढ़ना पड़ रहा था। दूर तक फैले आम के बाग़ों में आम की रुख़सती से जो उदास माहौल बना था उस माहौल के दर्द को कम करने का काम किया था बदन को सहलाती गुलाबी सर्दी ने।
आस पास के गाँवों में दीवाली की तैयारियां ज़ोरों पर थीं और इसी बीच 19 अक्टूबर 1911 की गुनगुनी सुबह सिराजुल हक़ के घर एक बच्चे का जन्म होता है। ज़मींदार पिता और ममता से भरी मां ने इस खूबसूरत बच्चे का नाम असरार रखा, असरार-उल-हक़ अपने आस पास की ज़मींदारी से अंजान इस मासूम बच्चे ने थोड़ा बड़े होकर जब करवट ली तो आस पास ज़मींदारी का माहौल पाया, लेकिन असरार के कोमल मन में ग़रीब, मज़लूमों के लिए सिर्फ़ मोहब्बत और हिमायत थी। हालाँकि घर के पढ़े लिखे माहौल और तरक्की पसंद ख़यालात ने असरार के अंदर एक ज़हानत भर दी।
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आगरा शहर से अपनी बुनियाद में शायरी की पूरी कायनात एकट्ठा किए असरार जब अलीगढ़ पहुंचे तो अलीगढ़ ने उनके कानों मे फूँक दिया कि तुम्हारा मुस्तक़बिल बनाने का हक़ मुझे दिया जाय। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शुरुआती दिनों में ही में असरार को कुछ हम ज़बां लोगों का साथ मिल गया जिसमें सरदार जाफ़री, हयातुल्लाह अंसारी, सिब्ते हसन, इस्मत चुगताई जैसे उभरते हुए शायर थे। मुशायरे की ख़बर ने असरार के दिल मे खलिश पैदा कर दी। अपने हुनर का मुज़ाहरा करने का ये एक बेहतर अवसर था।
शायरों के साथ शाम्यीन भी पूरे साजो सवार के साथ इस अदबी सफ़र का हिस्सा होने को बेक़रार थे। बड़े फ़ानूस और शमां के साथ आख़िर मुशायरा शुरू हुआ। कुछ हल्की, कमज़ोर और कुछ पुर्क़श हसीन शायरी के बाद आख़िर असरार का मौका आया। सफेद करीने से सिली शेरवानी और सफेद पायज़ामे में अपनी बड़ी बड़ी आँखों, बेहद सजीले चेहरे मोहरे और सधी चाल से असरार जब शमां तक पहुंचे, हॉल सिर्फ़ उनकी इस आमद पर फिदा हो चुका था। लेकिन अभी उसे और मुरीद होना था, अपनी बेहद दिलकश और गहरी आवाज़ मे जब असरार ने
"खूब पहचान लो असरार हूं मैं, जिनसे-उलफत का तलबगार हूं मैं,
इश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरी, फितना-ए-अक्ल से बेज़ार ही मैं,
एक लपकता हू शोला हू मैं, एक चलती हुई तलवार हूं मैं" सुनाई....
दम भर को पूरे हॉल मे सन्नाटा छा गया. अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में असरार -उल -हक़ का मजाज़ में बदलने का ये पहला बड़ा मौका था और इसी ने मजाज़ के अलीगढ़ आने और सब पर छा जाने का बड़ा एलान कर दिया। देखते-देखते मजाज़ शोहरत की उस बुलंदी को छूने लगे जो शायद 21-22 साल के नौजवान के लिए ख्वाब होता है। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के गोशे गोशे मे अब मजाज़ की चर्चा हो रही थी. कोई मजाज़ के बेहद असरदार शेर और आशार की बात करता, कोई उनके कद, आवाज़,कोई आँखे और खूबसूरती की चर्चा करता. ये वो दौर था जब मजाज़ के मिथ मे बदलने की शुरुआत हो चुकी थी। गर्ल्स कॉलेज मे ख़ास तौर पर मजाज़ को जानने, उनका दीदार करने, उनके शेर रूबरू सुनने को हर कोई ख्वाहिश मंद था. तालीम के इसी सफ़र मे मजाज़ लखनवी की पहली नज़्म की किताब "आहंग" छप चुकी थी।
अब मजाज़ सिर्फ़ एक तालिब-ए-इल्म नही थे बल्कि मशहूर शायर हो चुके थे. गर्ल्स हॉस्टिल की लड़किया मजाज़ की किताब अपने तकिये के नीचे रख के सोती थी कि कम अज़ कम मजाज़ उनके ख्वाब का हमसफ़र बने। अलीगढ़ के सफ़र में ही मजाज़ ने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को वो सौगात दी जो आज भी यूनिवर्सिटी के तराना के रूप मे मजाज़ को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी मे हर रोज़ ज़िंदा करती है.
"ये मेरा चमन है मेरा चमन है, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं
हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, एक सागरे नौ में ढलती है
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी टपकती है
जो ताक-ए-हरम मे रोशन है, वो शमा यहाँ भी जलती है
जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा
हर जु-ए-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गिरा पर बरसेगा"
ये बिल्कुल सच है की मजाज़ का अब्र हर जगह बरसा.....फकत अलीगढ़ यूनिवर्सिटी ही नही बल्कि पूरा हिन्दुस्तान मजाज़ की चमक से चकाचौंध हो रहा था। अपने दौर के दूसरे शायर से बिल्कुल जुदा मजाज़ रोमानी होने के बावजूद परियो की बात नहीं करते थे. वो अख़्तर शीरानी या दूसरे मशहूर शायरो की तरह सलमा, अज़रा की बात नही करते थे. वो इसी दुनिया की औरत की बात करते थे जो उनकी साफ ज़हनी बेहतरी की मिसाल थी.
"बताऊं क्या तुझे ए हमनशीं! किससे मोहब्बत है,
मैं जिस दुनिया में रहता हूं वो उस दुनिया की औरत है,
सरापा रंग-ओ-बू है पैकरे-हुस्नो-लताफत है,
बहिश्ते-गोश होती है गुहर-अफ्शानियां उसकी...."
जहाँ रोमानी तबीयत के मजाज़ अपने दिल और पसंद को बेहद सलीके से आसार मे ढाल रहे थे वही सियासी सामाजिक हालात भी उनसे अछूते नही थे. ये वो दौर था जब अलीगढ़ और लखनऊ में तरक्की पसंद तहरीक का ज़ोर पकड़ रहा था। मजाज़ इसके फाउंडर मेंबर्स मे से एक थे। सरदार ज़ाफ़री, साहिर लुधियानवी, जोश मलीहाबादी सहित कई बड़े शायर इस मूव्मेंट का हिस्सा बन रहे थे। हालात की नब्ज़ पर हाथ रखते हुए सियासत और सत्ता के विरोध में "बोल ! अरी ओ धरती बोल, राज सिंहासन डांवा डोल" लिखा। अलीगढ़ अब छूटने को था. लेकिन तेवर मे इन्क़िलाबियत थी।
"फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रबाब,
उठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इन्क़िलाब....
यही नहीं दुनियावी हालात पर लिखते हुए मजाज़ ने कहा कि
"बहुत मुश्किल है दुनिया का संवरना, तेरी ज़ुल्फों का पेंचो खम नहीं है"
दिल्ली ने मजाज़ को एक शादीशुदा महिला से इश्क़ हो गया लेकिन उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा। दिल के हाथों ये शिकस्त सहने का हौसला और बड़ा कलेजा मजाज़ के पास नहीं था। अब मजाज़ ने पीनी शुरू कर दी या यूं कहें बेतहाशा पीनी शुरू कर दी। अब शाम डूबने का भी इंतज़ार नहीं था। अपने साथ हुई इस बेवफ़ाई से मजाज़ इस कदर टूटे कि वो इन्तेक़ाम लेने लगे लेकिन मोहब्बत से भरा ये मासूम शायर ज़माने से तो इन्तेकाम ले नहीं सकता था चुनांचे वो सारा इन्तेकाम खुद से लेने लगा।
जाते-जाते दिल्ली को मजाज़ ये कहने से नहीं चूके "रुखसत-ए-दिल्ली ! तेरी महफ़िल से जाता हू मैं, नौहागर जाता हूं मैं, नाला-ए-लब जाता हूं मैं..." अपने टूटे दिल पर अपनों का मरहम लगाने के लिए लखनऊ माकूल जगह थी। दिल्ली और मोहब्बत की याद अभी मजाज़ के दिल से निकली नहीं थी। परेशान पिता ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते मजाज़ कि दिल्ली की एक लाइब्ररी मे असिस्टेंट लाइब्रेरियन की नौकरी लगवा दी। मजाज़ को खुद की बर्बादी का अच्छी तरह से पता था। उन्होंने लिखा है "मेरी बर्बादियों का हमनशीनों, तुम्हें क्या खुद मुझे भी ग़म नहीं है।" इसी दर्द, बेख़याली और निराशा के भंवर मे सर तक डूबे मजाज़ ने अपनी सबसे प्रसिद्ध ग़ज़ल "आवारा" लिखी। "ऐ ग़मे दिल क्या करूं, ऐ वहशते दिल क्या करूं" जज़्बात, सलीका, ग्रामर, मीटर की इतनी अच्छी ग़ज़ल उर्दू मे बहुत कम है जो ख़ासियत आवारा मे है. यही नही उनकी ग़ज़ल रात और रेल हालात पर बेहतरीन मेटाफर के इस्तेमाल की नज़्म है. " फिर चली है रेल इस्टेशन से लहराती हुई, नीम-शब की खामोशी मे ज़ेरे-लब गाती हुई... ज़िंदगी की बहुत से मसायल को रेल के प्रतीक मे इतनी हुनर्मन्दी से उर्दू शायरी मे पहले नही कहा गया था.
दिल्ली मे मजाज़ का अब सिर्फ़ इस्तेमाल हो रहा था। ऊंचे घराने के रईस लोग मजाज़ को अपनी महफ़िल में बुलाते, उनसे ग़ज़ले, उनके ज़बरदस्त फ़िकरे सुनते, उन्हें खूब शराब पिलाते और जब मजाज़ और ग़ज़ल सुनने की हालत में नहीं रह जाते तो उन्हें या तो बेसुध हालात में घर पहुंचा दिया जाता या कोठी के किसी खाली कमरे में बंद कर दिया जाता। अब तेज़ी से शराब मजाज़ को पीती जा रही थी। मजाज़ को अब बिना शराब के एक पल भी नींद नहीं आती, बचपन में भी देर रात तक जागने की वजह से घर वालों ने उनका नाम जग्गन रख दिया था लेकिन अब मजाज़ उर्फ जग्गन बिना नशे के सोने का नाम नहीं लेता। रात रात भर जगा रहता और खुद से बातें करता। दोस्तों की लाख कोशिश भी मजाज़ को बेहतर नहीं कर पा रही थी। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ सहित सारे करीबी दोस्तो ने मजाज़ के ख़ान पान से लेकर दूसरी ज़िम्मेदारी संभाल रखी थी लेकिन मजाज़ जो चाहिए थी वो सिर्फ़ शराब थी। खाना, पहनना या बाकी चीज़ों का मजाज़ को कोई होश न रहता। ऐसे हालात में फिर वही हुआ जो दोस्तों का डर था। एक बार फिर नर्वस ब्रेकडाउन ने मजाज़ को वहीं ला खड़ा किया जहाँ से 5 साल पहले वो निकले थे। फिर इलाज, तीमारदारी का लंबा दौर चला और मजाज़ थोड़े बेहतर हो चले। अपने दोस्त और मशहूर शायर और फिल्म नग्मानिगार साहिर लुधियानवी के कहने पर मजाज़ बंबई मे अपनी किस्मत आज़माने चल पड़े।
एक दो छिटपुट कामयाबी के अलावा बंबई भी मजाज़ को रास नहीं आ रही थी। मजाज़ की मशहूर ग़ज़ल "आवारा" को फिल्म ठोकर में गाया भी गया लेकिन मजाज़ के हाथ खाली ही रहे। बंबई का तेज़ मिजाज़ शहर मजाज़ के भोले और बेहद कोमल दिल के मुताबिक नहीं था। आज़ादी के बाद फैले दंगों में अपनी आँखो के सामने देखे एक क़त्ल का मजाज़ पर इतना असर हुआ कि तीन दिन तक मजाज़ ने कुछ भी नहीं खाया। ग़म और दहशत से वो बीमार भी पड़ गये। यहां पर फिर उनके दोस्त साहिर और मुनीश नारायन सक्सेना ने उनकी खूब खिदमत की। अपने अकेलेपन, दुनियावी छल, और लगभग हर तरह की नाकामयाबी ने मजाज़ को अंदर से भी बेहद कमज़ोर कर दिया था। अब मजाज़ की नज़्मों और अशआरों में भी मजाज़ के खराब ज़हनी हालात और दिमागी तवाज़ून का असर दिखने लगा था। हालाँकि हालात पर एक नज़र मजाज़ की बनी रहती। एक ऐसी ही मुलाक़ात में मजाज़ ने मशहूर अदाकारा नरगिस को देखकर जो शेर कहा वो मजाज़ के सुलझे और हुस्न तथा हालात पर एक साथ कहने का हुनर बताते है "तेरे माथे पर ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन, तू इसका परचम बना लेती तो अच्छा था" ये सिर्फ़ मजाज़ लिख सकते थे। रोमानी और इन्क़लाबियत दोनों अलग मिजाज़ को एक साथ किसी शेर मे कहना शायद ही किसी को आता था। अपने रोमानी शेर की वजह से उर्दू का कीट्स कहे जाने लगे मजाज़ में बहुत से रंग थे, बहुत से हुनर थे। मजाज़ के इसी हुनर को देखते हुए उनके दोस्त और मशहूर शायर असर लखनवी ने कहा था कि "उर्दू मे एक कीट्स पैदा हुआ था जिसे इन्क़लाबी भेड़िए उठा ले गये"
बिगड़ती तबीयत और उदास माहौल ने मजाज़ की ज़िंदगी को उधार का बना दिया था। 3 दिसंबर 1955 को लखनऊ में स्टूडेंट कन्वेन्शन के तहत बहुत बड़ा मुशायरा मुनक्कद हुआ। देश भर के सभी बड़े शोहरा एकराम ने इस मुशायरे मे शिरकत की। मजाज़ भी आए और मुशायरे को अपनी आमद से नया रंग दे दिया। किसी को क्या मालूम था कि मजाज़ को रूबरू सुनने का ये आख़िरी मौका था। 4 दिसंबर की रात मजाज़ अपने कुछ दोस्तों के साथ लखनऊ के लालबाग स्थित एक साधारण से शराबखाने पर गये। तिठुरती रात में छत पर दोस्तों के साथ शराब पी।बाकी दोस्त अपने हिस्से की पीके अपने दूसरे मसले हल करने अपने घर चले गये लेकिन मजाज़ को अब ना ज़माने से कुछ चाहिए था और ज़माने ने भी अब उसकी वैसी देखभाल करने में कोताही करना शुरू कर दिया था।
शराब के नशे मे बेहद सर्द रात मजाज़ ने छत पर खुले में गुज़ारी। सुबह लोगों ने उन्हें बलरामपुर हॉस्पिटल में दाखिल कराया लेकिन अब मजाज़ के पास जीने की कोई वजह नहीं बची रह गयी थी। आख़िर मजाज़ ने 5 दिसंबर को ज़िंदगी से इस्तीफ़ा दे दिया। इंसानी जज़्बे, बदलाव, चाहत, रोमानियत और बदलाव का इतना बड़ा शायर ना हुआ है, ना होगा। एक ज़माने मे जिसकी मिल्कियत पूरा हिन्दुस्तान थी, वो एक 6 फुट की कब्र का मालिक बन गया। अपने हालात को जानते हुए बहुत पहले ही मजाज़ ने लिख दिया था कि
"ज़िंदगी साज़ दे रही है मुझे, सहरो एजाज़ दे रही है मुझे
और बहुत दूर आसमानों से, मौत आवाज़ दे रही है मुझे"