खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥
भावार्थ:- दुष्टों के हृदय में बहुत अधिक संताप रहता है। वे दूसरों की संपत्ति (सुख) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरे की निंदा सुनते हैं, वहाँ ऐसे प्रसन्न होते हैं जैसे कोई रास्ते में पड़े खजाने को पाकर खुश होता है।
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काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥
भावार्थ:- वे काम, क्रोध, मद और लोभ के अधीन होते हैं और निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापों के घर होते हैं। वे बिना कारण ही सभी से बैर किया करते हैं। जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई ही करते हैं।
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥
भावार्थ:- वे लेने-देने के व्यवहार में झूठ का आश्रय लेकर दूसरों का हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींगें हाँका करते हैं कि- हमने लाखों रुपए ले लिए, करोड़ों का दान कर दिया। इसी प्रकार खाते हैं चना-चबैना और बताते हैं- खूब माल-पुआ खाकर आए। मतलब यह कि वे सभी बातों में झूठ ही बोला करते हैं। जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है, परंतु उसका हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान विषैले साँपों को भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपर से मीठे वचन बोलते हैं परंतु हृदय के बड़े ही निर्दयी होते हैं।
दो० - पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥
भावार्थ:- वे दूसरों से द्रोह करते हैं और पराई स्त्री, पराए धन तथा पराई निंदा में आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर-शरीर धारण किए हुए राक्षस ही हैं॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर त्रासन॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥
भावार्थ:- लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है (अर्थात लोभ ही से वे सदा घिरे हुए रहते हैं)। वे पशुओं के समान आहार और मैथुन के ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुर का भय नहीं लगता। यदि किसी की बड़ाई सुनते हैं तो वे ऐसी दुःखभरी साँस लेते हैं मानों उन्हें जूड़ी (बुखार के समय लगने वाली ठंड) आ गई हो।
जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥
भावार्थ:- और जब किसी को विपत्ति में देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो उन्हें दुनियाभर का राजपाट मिल गया हो। वे स्वार्थपरायण, परिवार वालों के विरोधी, काम और लोभ के कारण लंपट और अत्यंत क्रोधी होते हैं।
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥
भावार्थ:- वे अवगुणों के समुद्र, मंद बुद्धि, कामी (रागयुक्त), वेदों के निंदक और जबर्दस्ती पराए धन के स्वामी (लूटनेवाले) होते हैं। वे दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं; परंतु गुणीजनों से विशेष रूप से करते हैं। उनके हृदय में दंभ और कपट भरा रहता है, परंतु वे ऊपर से सुंदर वेष धारण किए रहते हैं।
दो० - ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥
भावार्थ:- ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेता में नहीं होते। द्वापर में थोड़े से होंगे और कलियुग में तो झुंड-के-झुंड होंगे॥