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वर्षा-राग: कवि उदय प्रकाश की कलम से बारिश के लिए

काव्य डेस्क

Kavita
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वर्षा राग-1



बरसे मेघ भरी दोपहर, क्षण भर बूंदें आईं
उमस मिटी धरती की साँसे भीतर तक ठंडाईं
आँखें खोलें बीज उमग कर गगन निहारें
क्या बादल तक जा पाएंगे पात हमारे?

वर्षा राग-2 

मैना डर कर फुर्र हो गई, बिजली तड़की
छींके के सपने में खोई पूसी भड़की
कैसी हलचल आसमान ने मचा रखी है
कल-परसों से नहीं किसी ने धूप चखी है

घड़ों-घड़ों पानी औटाओ, मूसलधार गिराओ
लेकिन सब चुपचाप करो, चिड़ियों को नहीं डराओ! 

वर्षा राग-3

यह काग़ज़ की नाव चली जाए अमरीका
सिखला दे उनको पूरब का तौर-तरीका
एट्म-बम से बिल्कुल भी धौरी बछिया नाहि डरती
न्यूट्रान से मड़र गाँव की मक्खी भी नाहिं मरती

गोबर ने चोंगी सुलगा कर लट्ठ सम्भाला
आ जाए अब रीगन हो या बेगिन साला।  
 
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एक महीने पहले
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