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Hindi Poetry: संदीप शर्मा की कविता- जन-जन की आशा बन जाए, जग भाषा बन जाए!

काव्य डेस्क

Kavita
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                                                  राम चरित या कृष्णायन हो हिंदी का वरदान है,
हों कबीर या फिर मीरा, सब हिंदी के दिनमान हैं,

ठुमक-ठुमक कर सूरदास के, कृष्ण नाचते हिंदी में,
हों रहीम या फिर हों खुसरो, गीत बांचते हिंदी में,

हिंदी में रसखान कृष्ण को, माखन भोग खिलाते हैं,
जात धर्म के झगड़े हिंदी में, खुद ही मिट जाते हैं, 

हिंदी में तुलसी ईश्वर को फिर इंसान बना देते, 
सेवा, मर्यादा, शक्ति की एक पहचान बना देते,

हिंदी में मतिराम बिहारी, प्रेम सुधा बरसाते हैं,
मलिक महोम्मद पद्मावती को, दिव्य कंठ से गाते हैं,

प्रेमचंद के अलगु जुम्मन, न्याय धर्म के ईश्वर हैं,
कठिन पूस की रात ग़रीबी और शोषण का ही स्वर है,

हिंदी में भोला हमीद, चिमटा खाला का लाता है,
हिंदी में अब्बू खाँ अपनी, बकरी को समझाता है,
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दिनकर और निराला इसमें, राष्ट्र धर्म निर्माण करें,
भारत को ही दिल की धड़कन, भारत को मन प्राण करें,

लहना सिंह ने अमर प्रेम के क्या अद्भुत प्रतिमान रचे,
प्रकृति के हैं रंग अनेक, पर कहो पंत से कहाँ बचे,

वरदायी की चार पंक्तियां, इतिहासों को बदल गई,
भूषण के छंदो पर प्राण लुटाने गर्दन उछल गई,

एक कल्पना लोक प्रेम, फिर एक अय्यारी हिंदी में,
चन्द्रकांता की संत्तती है प्यारी-प्यारी हिंदी में,

देख सकें फ़िल्में हिंदी में, दक्षिण ने हिंदी सीखी,
गांधी को भविष्य की किरणें, हिंदी में ही क्यों दिखी?

कितनी गाथा गाऊँ अब तो करोड़ों बेटे हैं इसके,
कितना प्यारा सृजन करें हैं, गुण गाऊँ किसके-किसके,

माँ हिंदी बस विश्व मनुज की एक आशा बन जाए, 
जन-जन की आशा बन जाए, जग भाषा बन जाए!!
2 वर्ष पहले
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