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Hindi Kavita: जब सवाल सड़क पर उतरते हैं

काव्य डेस्क

Kavita
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                            जब सवाल सड़क पर उतरते हैं,
        
                                                    
                            
तो सबसे पहले
बैरिकेड खड़े किए जाते हैं।

फिर आदेश आता है—
आवाज़ को धुएँ में बदल दो,
आँखों में आँसू भर दो,
ताकि वे भविष्य साफ़ न देख सकें।

लाठियाँ
सिर्फ़ देह पर नहीं पड़तीं,
वे संविधान की पंक्तियों पर भी
नीले निशान छोड़ जाती हैं।

आँसू गैस का हर गोला
हवा से पूछता है—
क्या सचमुच
सवालों की कोई गंध होती है
जिससे इतनी घबराहट है?

लेकिन इतिहास जानता है—
धुआँ देर तक नहीं टिकता।

आँसू
सूख जाते हैं।

घाव
कभी-कभी गीत बन जाते हैं।

और गीत
जब लोगों की आवाज़ बनते हैं,
तो संसद की ऊँची दीवारों से भी
ज़्यादा दूर तक सुनाई देते हैं।

क्योंकि
लाठी की उम्र
हमेशा छोटी होती है,

और सवाल की उम्र
हमेशा जनता जितनी लंबी।

ये कविता AI जनित है

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