1-
आग हवा का उत्तर लपटों से देती है
शब्दों से नहीं।
प्रेमिका प्यार का उत्तर चुंबनों से देती है
शब्दों से नहीं।
चुनौती का उत्तर मनौती नहीं कर्म है।
चुनौती का उत्तर कर्म से देना ही हमारा धर्म है।
2-
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नयनों में जमे हुए भावना के सागर।
पनिहारिन परेशान, आफ़त में हुई जान,
पनघट पर बैठी हुई, फूटी हुई गागर।
कैसे भरे पानी? कहाँ से भरे पानी?
गागर दो! गागर दो! पिघला दो सागर को!
भरने दो पानी, प्रभु, भरने दो पानी!
3-
पूर्ति होती है यात्राओं की
प्रेमियों के पुनर्मिलन में
रसोई से गुनगुनाने की आवाज़ आती है
देहरी पर अँगना के आर-पार
बातचीत यादों की जारी रखी जाती है
बैठक की खिड़की से क्यारी दिखती है पैंजी की
सिगड़ी पे कितली क्या जाने क्या बुदबुदाती है
सच, ज़िंदगी तब
दूध पी अलसाई इक पूसी बन जाती है।
कँटीले तारों से बँधे
बंदी अस्तित्व के
अविनीत शैया में दुविधा की
एक सनातन स्वप्न देखते हैं
स्वतः प्रवर्तित सर्वगत स्वच्छंदता का
आश्वस्त होते हैं।
अपरिचित किसी बालक की व्यस्त
मुस्कान से।
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