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क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम: आई याद आज जनम पुरानी, विदाई की थी वह शाम

काव्य डेस्क

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आई याद आज जनम पुरानी, विदाई की थी वह शाम
मैं रही खड़ी इस पार, तुम कश्ती ले चले उस पार

विदाई के उस पल में, वादा किया था
हमदम तुमने, रखोगे यादों में संजो के,
लौट आओगे खेलोगे फिर से
खेल, वह पुराने खेल

आज तक न आए हाय। मेरी आँसू-पाँती
बन-बिहँगी दिशी-दिशी लिए घाए, हाय!
तुझको न ढूंढ़ पाए, मेरा - 
वन-पपीहा कुँजे, गहन बन में
नाम ले तेरा, पियू कहाँ रट,रटे रे

रुक गया तरन्नुम, हाय!
लौटा पंक्षी दिल पे तीर बेवफा का लिए, हाय।

2 वर्ष पहले
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