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Independence Day 2025: आज़ादी की खातिर

काव्य डेस्क

Kavita
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                            जो आज़ादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 
        
                                                    
                            
हम धीरे-धीरे उनके बलिदानों को भूल गए 
जो आज़ादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 
गिनी-चुनी तारीखों पर हम उनको याद किया करते हैं
कुछ फूल चढ़ाकर, कुछ भाषण देकर एक रस्म निभा दिया करते हैं 
हम धीरे-धीरे उनके आदर्शों पर चलना भूल गए 
जो आजादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 
वो लोग भी किस जीवट के थे 
लाठी खाई, कोड़े खाए, जेल गए
फिर भी अपने मकसद पर डटे रहे 
अंतिक सासों तक 'इन्कलाब जिंदाबाद' दोहराते रहे 
आज़ादी की खातिर जिस्मानी चोटों को भूल गए और हंसकर फांसी पर झूल गए 
हम क्यूं उनके बलिदानों को भूल गए 
जो आज़ादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 
उनका बलिदान सफल हुआ, उनका सपना साकार हुआ
तोड़ गुलामी की जंजीरें, पंद्रह अगस्त सन सैंतालिस को अपना भारत आज़ाद हुआ 
अंग्रेज यहां से चले गए 
पर हम धीरे-धीरे कुछ ऐसे अंग्रेजियत में मद-मस्त हुए कि अपनी संस्कृति को भूल गए 
उनके सपनों के भारत को भूल गए, जो आज़ादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 
हमको आजाद हुए साल अठत्तर हो गए 
अब आज कसम हम खाएंगे, हर घर में भारतीयता की अलख जगाएंगे
उनके सपनों का देश बनाएंगे, जो आज़ादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 
हम क्यूं उनके आदर्शों पर चलना भूल गए, जो आज़ादी की खातिर हंसकर फांसी पर झूल गए 

~ राकेश कुमारी
एक वर्ष पहले
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