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अटल बिहारी वाजपेयी: सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल

काव्य डेस्क

Kavita
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सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल
रूई से धुँधलके में मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता
स्वयं को दूसरों की दृष्टि से मैं देख पाता हूँ
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सर्द साँसों ने चिनारों को झुलस डाला
मगर हिमपात को देती चुनौती एक द्रुममाला
बिखरे नीड़
विहँसी चीड़
आँसू हैं न मुस्कानें
हिमानी झील के तट पर अकेला गुनगुनाता हूँ
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ
 
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8 महीने पहले
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