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नदी का घर (लघुकथा) - विजय जोशी 'शीतांशु'

काव्य डेस्क

Katha
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आज गांव ने शहर से ऐसा प्रश्न कर लिया जिसका ज़िक्र शहर के लिए इतिहास हो गया था। गांव ने पूछा- 'तुम्हारे यहां एक नदी रहा करती थी। उस नदी का घर कहां है?"


आधुनिक शहर ने तपाक से प्रश्न पर, आश्चर्यचकित प्रश्न कर दिया! 'वह पुराना नाला?'
गांव अभी अपने प्रश्न पर कायम था। 'नहीं-नहीं, उस 'नदी के घर' का पता पूछ रहा हूं जिसे पार करके तुम्हारे लिए दूध दही लेकर मेरे अपने गांव के बेटे जाते थे।' और ''लौटते समय उसी के किनारे शाम को बैठकर अपनी थकान मिटाते थे।''
गांव फिर बोला- ”जो तुम्हें याद है, वह बदबूदार नाला तो तुम्हारी देन है। जिसे तुमने मिट्टी से बुझवाया। तुम्हारी विकास यात्रा का कुत्सित आयाम था।''
शहर बोला- 'भाई वह तो ठीक है पर ''नदी का घर'' तो मुझे भी नहीं मालूम है। तुम किस जमाने की बात कर रहे हो?'
गांव आज बहुत गुस्से में था। उसके यहां आने वाली जल स्तोत्र मार्ग अवरुद्ध हो गया था। उसके युवा पलायन कर गये थे। दूध की नदियों वाले गांव मे मदिरालयों ने पांव पसार लिये थे। 
गांव बोला-अपने बड़े भाई  महानगर से पूछो जिसने तुम्हें यहां बसाया।'
ऊंची-ऊंची चिमनियों से धुंआ उगलता शहर मौन था। 
“नदी का घर? ‘’,
आधुनिक उद्योगनगर के नीचे गर्त में धसा पड़ा था। जिसके सीने पर मलवा भर भर कर शहर ने अपना घर बसा लिया था।

- विजय जोशी 'शीतांशु'

5 वर्ष पहले
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