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8 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने भागवत व रामकथा करनी शुरू कर दी थी रामभद्राचार्यजी ने

काव्य डेस्क

Halchal
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                                                  जगद्गुरु रामभद्राचार्य को संस्कृति साहित्य के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार 2023 से सम्मानित किए जाने की घोषणा हो चुकी है। धर्मचक्रवर्ती, तुलसीपीठ के संस्थापक, पद्मविभूषण रामभद्राचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में रामलला के पक्ष में शास्त्रों के उद्धरण के साथ गवाही भी दी थी। उनका वास्तविक नाम गिरिधर मिश्र भी है, जिनका जन्म 14 जनवरी 1950 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शादीखुर्द गांव में हुआ, वे दृष्टिहीन हैं। वे रामानन्द सम्प्रदाय के वर्तमान चार जगद्गुरु रामानन्दाचार्यों में से एक हैं और इस पद पर 1988 ई. से प्रतिष्ठित हैं। 

उन्हें 22 भाषाओं का ज्ञान है इसलिए उन्हें ‘बहुभाषाविद’ भी कहा जाता है।  उनकी शख्सियत की शोहरत न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी है।

वे चित्रकूट स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के संस्थापक और आजीवन कुलाधिपति हैं। यह विश्वविद्यालय केवल चतुर्विध विकलांग विद्यार्थियों को स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम और डिग्री प्रदान करता है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य दो मास की आयु में नेत्र की ज्योति से रहित हो गए थे और तभी से प्रज्ञाचक्षु हैं। 
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अध्ययन या रचना के लिए उन्होंने कभी भी ब्रेल लिपि का प्रयोग नहीं किया है। वे बहुभाषाविद् हैं । उन्होंने 80 से अधिक पुस्तकों और ग्रंथों की रचना की है, जिनमें चार महाकाव्य (दो संस्कृत और दो हिन्दी में), रामचरितमानस पर हिन्दी टीका, अष्टाध्यायी पर काव्यात्मक संस्कृत टीका और प्रस्थानत्रयी (ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और प्रधान उपनिषदों) पर संस्कृत भाष्य सम्मिलित हैं। उन्हें तुलसीदास पर भारत के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों में गिना जाता है।  अमेरिका, कनाडा आदि देशों में कथा का वाचन किया है। रामभद्राचार्य 1986 में चित्रकूट आ गए और तुलसी पीठ की स्थापना की।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य 2 महीने की उम्र में आंखों की रोशनी जाने के बाद भी 4 साल की उम्र से ही कविताएं करने लगे और 8 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने भागवत व रामकथा करनी शुरू कर दी थी।  जगद्गुरु रामभद्राचार्य को भारत सरकार ने उनकी रचनाओं के लिए 2015 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 
 
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