डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री पद्मा सचदेव का निधन हो गया है। पद्मा सचदेव की पहचान कवयित्री होने के साथ-साथ एक उपन्यासकार की भी है। वह डोगरी के अलावा हिंदी में भी लिखती थीं। 'मेरी कविता मेरे गीत' के लिए उन्हें 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। वर्ष 2001 में पद्म श्री और वर्ष 2007-08 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कबीर सम्मान प्रदान किया गया। वर्ष 2016 में डोगरी भाषा में लिखी उनकी कृति 'चित्त चेते' के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया, यह उनकी आत्मकथात्मक रचना है।
डोगरी साहित्य जिन रचनाकारों पर गर्व कर सकता है उनमें पद्मा सचदेव का नाम सर्वोपरि है। इनका जन्म जम्मू के पुरमंडल गांव में 17 अप्रैल 1940 को हआ था। बचपन के दिनों से ही पद्मा सचदेव ने अपनी मातृभाषा डोगरी में कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। 15 वर्ष की उम्र में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई। 'तेरी बातें ही सुनाने आये' उनकी डोगरी रुबाइयों का संग्रह है। इन रुबाइयों में लौकिकता और पारलौकिकता के संकेत भी देखे जा सकते हैं। पद्मा सचदेव की ये रुबाइयां मन के एकांत को टटोलकर रची गई हैं। विशेषकर, एक भावनाप्रवण स्त्री की हार्दिकता को इनमें मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है।
इसके साथ उन्होंने हिंदी सिनेमा के लिए गीत भी लिखे हैं।
मेरी कविता मेरे गीत, मैं कहती हूं आंखिन देखि, अमराई, फिर क्या हुआ, जम्मू जो कभी सहारा था इसके अलावा तवी ते चन्हान, नेहरियां गलियां, पोता पोता निम्बल, उत्तरबैहनी, तैथियां, गोद भरी तथा हिन्दी में एक विशिष्ठ उपन्यास 'अब न बनेगी देहरी' आदि प्रकाशित कृतियां हैं।
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घिरा था बादल मगर बरसा न था...
चलते-चलते सूखा जो दरिया न था
घिरा था बादल मगर बरसा न था
डूब कर उछला नहीं जो एक बार
डूबा ही था वो कभी तैरा न था
जिंदगी न मुझको बहलाओ बहुत
मैं समझ पाती न इशारे बहुत
रहगुजर लंबी थी रात थी काली
एक ही था चांद थे तारे बहुत
धरती के मुंह पर भी मक्खन मलो तुम...
चलो उठो साथ मेरे चलो तुम
धरती के मुंह पर भी मक्खन मलो तुम
चांद तुम गल कर भी फिर आ जाओगे
हमको देखो गलो तो फिर गलो तुम
एक अक्षर की ये दुनिया सारी है
अपने में पूरी ये दुनिया सारी है
हां में हां कहते रहो अच्छी है ये
नहीं तो न्यारी ये दुनिया सारी है
जागती भी होगी ही रानी कोई...
रात अकेली थी न संगी कोई
जान बूझ कर तो न डूबा कोई
अधजगी-सी रात में टहलिन जग
जागती भी होगी ही रानी कोई
नीम की टहनी या मां की बांह है
बिन दरख्तों के भटकती छांह है
बादल आसमान से नीचे गिरा
धरती को लग आया नवां माह है
आज तक जो था चरित्तर न रहा...
शहर में अब कोई मित्तर न रहा
आज तक जो था चरित्तर न रहा
आस के तोते सभी तो उड़ गए
पालने को कोई तीतर न रहा
पानी तेरी आहटें हलकी नहीं
हिल गयीं चाहे मगर छलकी नहीं
जब भी समंदर में तुम मिल जाओगे
कौन हो तुम कुछ खबर होगी नहीं