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कविता के ज़रिए प्रधानमंत्री मोदी ने किया सागर से संवाद

दीपाली अग्रवाल

Halchal
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                                                  हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ तमिलनाडु के महाबलीपुरम् के तट पर थे। इसी दौरान उन्हें कुछ पल समंदर के साथ भी मिले। इस संबंध में उन्होंने ट्वीट करते हुए एक कविता लिखी -

उन्होंने लिखा कि 
"कल महाबलीपुरम में सवेरे तट पर टहलते-टहलते सागर से संवाद करने में खो गया। ये संवाद मेरा भाव-विश्व है। इस संवाद भाव को शब्दबद्ध करके आपसे साझा कर रहा हूं"

कविता

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हे सागर
तुम्हें मेरा प्रणाम

तू धीर है, गंभीर है,
जग को जीवन देता, नीला है नीर तेरा
ये अथाह विस्तार, ये विशालता,
तेरा ये रूप निराला

हे सागर
तुम्हें मेरा प्रणाम

सतह पर चलता ये कोलाहल, ये उत्पात,
कभी ऊपर तो कभी नीचे।
गरजती लहरों का प्रताप,
ये तुम्हारा दर्द है, आक्रोश है
या फिर संताप ?
तुम न होते विचलित
न आशंकित, न भयभीत
क्योंकि तुममें है गहराई।

हे सागर
तुम्हें मेरा प्रणाम

शक्ति का अपार भंडार समेटे,
असीमित ऊर्जा स्वयं में लपेटे।
फिर भी अपनी मर्यादाओं को बांधे,
तुम कभी न अपनी सीमाएं लांघे
हर पल बड़प्पन का बोध दिलाते

हे सागर
तुम्हें मेरा प्रणान

तू शिक्षादाता, तू दीक्षादाता
तेरी लहरों में जीवन का 
संदेश समाता
न वाह की चाह.
न पनाह की आस,
बेपरवाह सा ये प्रवास

हे सागर 
तुम्हें मेरा प्रणाम

चलते-चलाते जीवन संवारती
लहरों की दोड़ तेरी
न रुकती. न थकती,
चरैवती, चरैवती, चरैवती का मंत्र सुनाती 
निरंतर... सर्वत्र
ये यात्रा अनवरत 
ये संदेश अनवरत

हे सागर 
तुम्हें मेरा प्रणाम

लहरों से उभरती नई लहरें
विलय में भी उदय
जनम-मरण का क्रम है अनूठा
ये मिटती-मिटाती तुम में समाती
पुनर्जन्म का अहसास कराती

हे सागर
तुम्हें मेरा प्रणाम

सूरज से नाता पुराना
तपता-तपाता
ये जीवंत-जल तुम्हारा
ख़ुद को मिटाता, आसमान को छूता,
मानो सूरज को चूमता
बन बादल फिर बरसता
मधु भाव बिखेरता
सुजलाम-सुफ़लाम सृष्टि सजाता

हे सागर
तु्म्हें मेरा प्रणाम

जीवन का ये सौंदर्य
जैसे नीलकंठ का आदर्श
धरा का विष, ख़ुद में समाया,
खारापन समेट अपने भीतर,
जग को जीवन नया दिलाया,
जीवन जीने का मर्म सिखाया

हे सागर
तुम्हें मेरा प्रणाम
6 वर्ष पहले
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