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पुस्तक समीक्षा: बोरिंग रोड के बाराती

काव्य डेस्क

Book Review
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                                                  किताब - बोरिंग रोड के बाराती

लेखक - सिद्धार्थ मिश्रा
प्रकाशन - कृते सृअव क्रिएशन्स
समीक्षक - अमित शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, टेक्निया इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, आई पी यूनिवर्सिटी, दिल्ली

वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद् श्री सिद्धार्थ मिश्रा जी का नया कहानी-संग्रह है – 'बोरिंग रोड के बाराती।' कहानी-संग्रह में कुल आठ कहानियां हैं। कहानियां गल्प से ज्यादा संस्मरण हैं। जिन लम्हों को लेखक ने जिया है उन्हें ही कागजों पर उतारा है। लेकिन ये संस्मरण जब शब्दों के रूप में सामने आते हैं तो व्यक्तिगत परिधि से कहीं दूर निकल कर पूरे परिवेश और समाज को खुद में समेट लेते हैं। विभाजनपूर्व बिहार की सांस्कृतिक विविधता और जटिल सामाजिक परिवेश को वे बड़े ही सहज-सरल ढंग से आपके सामने रख देते हैं। सिद्धार्थ मिश्रा जी मूलत: पत्रकार रहे हैं, वो भी अंग्रेजी के। ऐसे में हिन्दी में इतनी सरलता से पाठकों के मन तक उतर जाना उनकी बड़ी सफलता मानी जाएगी। 

ये कहानियां यूं तो बिहार-झारखंड के खान-पान, रहन-सहन, पहनावे और रीति-रिवाजों का जिक्र करती है – लेकिन इन कहानियों में गुंथी रिश्तों की गर्माहट और धीरे-धीरे इनके दरकने का दर्द इन्हें स्थानीयता से परे बनाता है। इन कहानियों का भूगोल भले ही विभाजनपूर्व बिहार के शहरों जैसे – पटना, भागलपुर, रांची, बोकारो आदि के आस-पास घूमता है, लेकिन अपने कथ्य में ये कहानियां पूरे सांस्कृतिक विमर्श का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन कहानियों के किरदार स्थानीय होकर भी वृहत सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। मिसाल के तौर पर पहली कहानी में दिखायी गयी ईयाजी। ईयाजी, बिहार के एक भरे-पूरे संयुक्त परिवार के मुखिया रायसाहब के देहान्त के बाद परिवार में सबसे निर्णायक स्थान रखती हैं। ध्यान से देखें तो परिवार में प्रमुख भूमिका निभाने वाली ऐसी बुजुर्ग महिलाएं आपको हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके और दूसरे अन्य राज्यों में भी आसानी से दिखायी पड़ जाएंगी। पूर्णत: पुरूष प्रधान माने जाने वाले इन समाजों में अधिकार की इसे जटिल संरचना को ये कहानी बहुत आसानी से बयान कर देती है। इसलिए स्थानीयता के भरपूर वृतांत के बावजूद ये किताब सामूहिक सामाजिक मूल्यों का बयान करती नजर आती है। 
 
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कई जगहों पर ये कहानियां चुपचाप समाज के बदलते समीकरणों की ओर भी इशारा कर देती है। कई जगहों पर सिद्धार्थ मिश्रा जी को पत्रकार होने का भी लाभ मिलता है। वो समाज में आते जटिल परिवर्तनों को ज्यादा बेहतर देख-समझ सकते हैं। कहानी ‘विश्व कप विजेता’ में उनकी कहानीकार वाली दृष्टि मिश्र टोली में जाति बंधन में जकड़ी मानसिकता को आसानी से देख लेती है। वहीं एक पत्रकार की नजर उससे आगे तक जाती है। वो लिखते हैं – “उस समय तक दबंगई पर सवर्णों का एकाधिकार नहीं रह गया था।“ बिहार की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि जगन्नाथ मिश्रा से लेकर लालू यादव के राज तक आया बदलाव सामाजिक परिवर्तन का ही नतीजा था। 

किताब की विशेषता है कि ये एक स्थानीय संस्कृति में छिपी विभिन्न संस्कृतियों को बड़ी आसानी से आपस में समेट लेती है। विभाजनपूर्व बिहार की संस्कृति में बसी अंग, मिथिला, भोजपुर और छोटानागपुर के पठारी इलाकों की संस्कृति किस तरह अपनी विभिन्नता में भी एकरुप हो जाती है- इसे समझना अगर मुश्किल लगे तो आप इस संग्रह की कहानियों को पढ़े। इस विभिन्नता वाली एकरुपता को आप आसानी से समझ पाएंगे। 
 

ये कहानियां बदलते वक्त के दस्तावेज की तरह भी सामने आती हैं। सत्तर से लेकर नब्बे के दशक के दौरान, हमारी संयुक्त परिवार की संस्कृति किस तरह एकल परिवारों में तब्दील हो गयी – ये कहानियां इसके कारणों और कारकों की पड़ताल करती नजर आती हैं। संयुक्त परिवार में रिश्तों का सुख बटोरने के बाद बड़े शहरों की सफलता भी उस सूनेपन को नहीं भर पाती है। इन कहानियों में सूनेपन की इस बैचेनी को महसूस किया जा सकता है। ये कहानियां बारात से लेकर श्राद्ध तक के रीति-रिवाजों का वर्णन तो करती है लेकिन साथ ही साथ जीवन दर्शन भी सिखा जाती है।
 
सबसे बड़ी बात है सुख-दुख के ये तमाम रंग हास्य की फुहारों में भिगो कर आपके सामने पेश किए गए हैं। ऐसे में बोरिंग रोड के बारातियों के ये किस्से आपको कतई बोर नहीं करेंगे, इसकी गारंटी है। 
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