अभिनेता को रंगमंच पर अपने अस्तित्व को अपनी ही संवेदना के साथ नए रूप में गढ़ना होता है। रूपांतरित होकर कोई नया वेशविन्यास लेकर समानान्तर सृजन करना पड़ता है।भाई अरुनशेखर ऐसे ही रंगकर्मी हैं। अनेक धारावाहिकों में अभिनय पटकथा लेखन आदि करते रहे हैं। उन्होंने कुछ कवितायेँ लिखी हैं| अवध के हैं तो अवधी मातृभाषा है उनकी । मातृभाषा रचानात्मक लोगों को मौलिक संवेदना का उच्छ्वास देती है| उनकी ये कविताएं उनके जीवन के अनेक संवादधर्मी वाचिक अभिनय की शैली का परिचय देती हैं। कवि ने अपने पहले ही संग्रह का नाम रखा "मेरा ओर न छोर" यह शीर्षक एक सनातन रूपक के विश्लेषण से हमें जोड़ता है। रंगभाषा वाले लोग सामान्य से विशेष और विशेष से सामान्य हो लेने की कला भी जानते हैं।इनमें कुछ कविताएं तो किरदारों की तरह बतियाने लगती हैं। कुछ सूत्रधार की तरह पर्दा उठाकर नई सूचनाएं भी दे जाती हैं।
रंगमंच मूलत: देह की भाषा है और कविता मन की भाषा है। अपने समय को हम सभी अपने चश्मे से देखते हैं| कवि ने भी अपनी तरह से देखा और जिया है। संग्रह की पहली कविता आकर्षित करती है कि आगे और कविताओं को भी पढ़ा जाए-
समय कभी कभी ऐसे सरकता है
कि जैसे पाँव में बाँध लिए हों पत्थर
और कभी कभी ऐसे फुर्र हो जाता है
जैसे अभी पलक झपकी
जैसे कोई पत्ता हिला
जैसे किसी ने कहा हो, अरे!
तो ये संवेदना के पत्ते को हिलते देखना और उसे अनुभव करने की बात तो बहुत लोगों के जीवन में आती है लेकिन उसे भाषा में उतार पाना कविता है| चतुर रंगकर्मी की भाषा बोलती हुई आगे चलती है| इसी प्रकार दूसरी कविता ‘एक दिन’ में कवि को मानो दुःख की पोटली लिए हुए संघर्ष करते अनाम लोग दिखते हैं| मदारी की तरह नचाने वाला भी दुःख ही है जो अपने ढंग के किरदार को चुन लेता है|मनुष्य जब अपना दुःख दूर करना चाहता है तब वह दूर नही होता फिर एक स्थित आती है कि वह अपने दुःख से ही प्रेम करने लगता है| अरुनशेखर जिस पांचवे आदमी के दुःख की बात करते हैं वह चार साथियों की फ़िक्र में चिंतित है और चिंतित होने की चरम स्थिति तक जाकर वह मर ही गया| जैसे किसी ने आत्महत्या कर ली हो अपने व्यक्तिगत कारणों से ही या कि परिजनों की चिंता में |
एक कविता है ‘’याद” इसमें भी कवि की अभिव्यक्ति भंगिमा वही है किन्तु कवि की भाषा और संवेदना मातृभाषा अवधी के ‘हरियरपन’ से उसे जोड़े खड़ी है| ये हरापन और ताजगी ही अरुनशेखर की इन तमाम संवेदनाओं को कविता बनाती हैं-
अभी अभी
एक धूप का टुकड़ा
गुजरा है इधर से
मेरी आखों के हरियरपन से
वो भी रंग गया।
अपने सकारात्मक हरियरपन से धूप को रंग डालने की कल्पना वही कर सकता है जो जीवन में संघर्ष और प्रगति के तर्क को समझ गया हो| समझने से आगे बढ़कर अपनी सकारात्मकता से धूसर चिपचिपे परिवेश को रंग डालने के लिए आतुर हो| ऐसे ही वातावरण में अंकुरण होता है और कृषि संस्कृति से आये कवि को अंकुवाने का निहितार्थ मालूम है| अभिनय शीर्षक एक कविता है जिसमें कवि जानता है कि लोग कैसे एक दूसरे के जीवन में घुस कर किसी को लंगडी मार कर आगे बढ़ जाते हैं| वे लोग असल में अपना किरदार नहीं निभा रहे होते हैं| अपना किरदार ईमानदारी से निभाने से ही परकाया प्रवेश का अर्थ जाना जा सकता है| ‘कुर्सी’ शीर्षक कविता में कवि साफ़ करते हुए कहता है-
जैसे होता है
परकाया प्रवेश
वैसे ही कुर्सी प्रवेश करने लगती है
आदमी के अन्दर धीरे धीरे ..
अनेक कविताएं वैयक्तिक अनुभवों तक सीमित भी रह गई हैं इसके बावजूद वे अपने रंग और अपनी उपस्थिति से पाठक को आकर्षित करती हैं।कविताओं को जब पाठक के हिसाब से प्रस्तुत किया जाता और जनसंवाद से जोड़ा जाता तो ये कविताएं और मुखर हो जातीं। एक कविता है ‘लड़की’ जिसमें कवि ने अनेक खूबसूरत शेड्स बिखराए हैं| लेकिन थोड़ा लड़की होकर उसके मन की बात जानने की कोशिश कवि करता तो कविता और बेहतर बन जाती-
‘फूल है
तितली है
लड़की किसी पुराने शहर की
संकरी गली है|’
हालांकि संग्रह में कुल साठ छोटी छोटी काविताएं हैं लेकिन कुछ कविताएँ बहुत आकर्षक हैं|कवि थोड़ा कबीरपंथी भी हो तो सार्वजनिक तौर पर कविताओं का आयतन बढ़ जाता है। ये कवितायेँ कवि के अपने व्यक्तिगत अनुभवों की श्रंखला के रूप में आकार लेती हैं आशा और सकारात्मकता का संचार भी करती हैं| किन्तु हमारे आसपास का समाज और उनकी समस्याएँ देखने सुनने का अवसर या अवकाश भी कवि को निकालना चाहिए| सामाजिक जीवन में जितनी मक्कारी बढ़ी है उतना ही मनुष्य चतुर भी हुआ है,शोषण भी बढ़ा है। इसके साथ दुख भी बढ़ा है।कविता केवल रूपवादी आरेखन ही नहीं है,कविता हो या कोई कला उसका पहला लक्ष्य यथार्थ जीवन में मनुष्यों के दुःख भुलाने में सहायक होना भी होता है कमाई, यश आदि तो बाद के लक्ष्य हैं| अक्सर कविताएं अच्छी या कम अच्छी होती हैं। आशा है अगले कविता संग्रह में कुछ बड़े आयतन और जनसरोकारों की भाषा हमें देखने को मिलेगी। कवि की काव्यभाषा और संवेदना के शिल्प को लेकर आश्वस्त हूँ, कवि के पहले संग्रह से बहुत उम्मीद बनती है ।
मेरा और न छोर (कविता संग्रह)
कवि: अरुनशेखर
प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स,गौतमबुद्ध नगर
संस्करण:2020
मूल्य-200