हमारे यहां अमूमन नौकरशाहों को केंद्र में रखकर लेख या किताब नहीं लिखे जाते। जबकि, एक नौकरशाह के तौर पर परमेश्वर नारायण हक्सर के सुदीर्घ जीवन को देखें, तो चौंकना पड़ता है कि आजाद भारत के कई युगांतरकारी फैसलों, बड़ी कूटनीतिक विजयों और सरकारी कामकाज और योजनाओं में योग्यतम लोगों को उनकी प्रतिभा के अनुरूप महत्वपूर्ण भूमिकाएं सौंपने में पर्दे के पीछे उनकी भूमिका थी। परमाणु अप्रसार संधि पर भारत का रुख तैयार करना हो या खुफिया एजेंसी रॉ का गठन, बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला हो या शिमला समझौता, बांग्लादेश को आजाद कराते हुए मुक्तियोद्धाओं को समर्थन और शरणार्थियों को शरण देने का फैसला हो या भारत-सोवियत मैत्री संधि-इन सबमें पीएन हक्सर की केंद्रीय भूमिका थी। वह कम्युनिस्ट थे, और एक समय पदानुक्रम में एबी वर्द्धन से बहुत वरिष्ठ थे।
नेहरू की समाजवादी नीतियों के वह जबर्दस्त प्रशंसक थे, हालांकि समान नागरिक संहिता के बजाय हिंदू कोड बिल लाने के आलोचक और नेहरू-लियाकत समझौते के उस प्रावधान के वह घोर विरोधी थे, जिसमें भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान की और पाकिस्तान के हिंदुओं को भारत की जिम्मेदारी मानने पर सहमति बनी थी। जैसा कि उनकी मानवाधिकार आंदोलनकारी बेटी नंदिनी हक्सर कहती हैं, वह नेहरू के फैन होने के बावजूद उन्हें देवता नहीं मानते थे। हेनरी किसिंजर तक घनघोर अमेरिका-विरोधी हक्सर की बौद्धिकता के कायल थे, जबकि 'भारत से हजारों साल तक लड़ने' की टिप्पणी पर भुट्टो को उन्होंने उनके घर में घेरकर निरुत्तर कर दिया था।
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देश के सबसे ताकतवर नौकरशाह के बारे में कहने पर उसकी तानाशाही छवि बनती है, पर हक्सर के साथ ऐसा नहीं था। प्रधानमंत्री को इंदु कहने वाला यह शख्स सरकारी नीतियों से लेकर मंत्रिमंडल में फेरबदल तक में अपनी दबंग बौद्धिकता की छाप छोड़ता नोट लिखता था, अगले ही क्षण दुर्गम इलाके से आई अनाम लेखक की चिट्ठी का उतनी ही सहृदयता से जवाब देता था। वह नेहरू के समय नौकरशाही में आए, इंदिरा गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहे और राजीव गांधी को अपने सुझावों से प्रभावित किया। राजीव गांधी की मौत के बाद उन्होंने नरसिंह राव को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया, जबकि राव के मुकाबले अर्जुन सिंह के वह ज्यादा करीब थे।
अप्रिय सत्य कहने की शक्ति, सही सलाह देने का विवेक और अतुलनीय ईमानदारी हक्सर को कद्दावर बनाती थी। मुश्किलों में उनकी कूटनीति काम आती थी, जो उन्होंने कृष्ण मेनन से सीखी थी। वह इंदिरा गांधी को कह सकते थे कि कारोबारी संजय गांधी को प्रधानमंत्री निवास में नहीं होना चाहिए। इतने बौद्धिक और क्षमतावान व्यक्ति की अपनी महत्वाकांक्षा नहीं थी, उनकी निष्ठा सिर्फ इंदिरा गांधी के प्रति थी। इसके बावजूद संजय गांधी के विरोध की कीमत उन्हें आपातकाल में चुकानी पड़ी, जब उनके व्यापारी चाचा समेत व्यापार में हिस्सेदार हक्सर की पत्नी को भी गिरफ्तार होना पड़ा। विज्ञान से लेकर विदेश नीति तक में दखल रखने वाला यह नौकरशाह साहित्य और कला के मामले में उतना ही संजीदा था। सरकार के विरोध के बावजूद हक्सर ने हिंदी लेखक यशपाल और बांग्ला फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक को क्रमशः पद्म भूषण और पद्मश्री दिलाई थी-हालांकि ये दोनों कम्युनिस्ट थे। पर खुद हक्सर ने पद्म विभूषण जैसा सम्मान भी स्वीकार नहीं किया।
हक्सर के व्यक्तिगत पत्रों और विभिन्न आर्काइव्स में मौजूद उनके मेमो से गुजरते हुए जयराम रमेश ने यह अविस्मरणीय किताब लिखी है, जो आजाद भारत के बाद के संघर्षों, उपलब्धियों और कशमकश के बारे में बताती है। किताब यह भी बताती है कि इंदिरा के दौर में सोवियत संघ से भारत की नजदीकी के पीछे हक्सर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी।
किताब- इंटरविन्ड लाइव्स-पीएन हक्सर एंड इंदिरा गांधी
लेखक - जयराम रमेश
प्रकाशक - सिमोन एंड स्यूस्टर इंडिया
मूल्य - 799 रुपये