किसी भी देश में घुसपैठ की समस्या विश्व-व्यापी है लेकिन भारत जैसे संवेदनशील और बड़ी जनसंख्या वाले देश में ये मामला और भी गंभीर हो जाता है। भारत देश के संदर्भ को लेकर ही पूर्णिमा शर्मा ने किताब लिखी है घुसपैठिए। लेखिका का कहना है कि - देश में अगर जनसांख्यिकी बदली है तो मतदाता सूची में भी बड़ा बदलाव आया है। इसमें एक सवाल ये भी छुपा हुआ है कि - क्या घुसपैठिए 1980 के दशक से मतदाता बनकर लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों पर प्रहार करते रहे? इस चुनौती के साथ ही उन्होंने देश के संसाधनों का भी उपभोग करना शुरु कर दिया। बंगाल इस घुसपैठ के विषय में सबसे अधिक नाज़ुक रहा है ख़ास तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठ।
पूर्णिमी शर्मा बताती हैं कि नागरिकों की सतर्कता ही इस घुसपैठ की समस्या से देश को निकालने में काम करेगी। किताब गरुण प्रकाशन से आई है।
एक महीने पहले