विज्ञापन

कर्तव्यों की अपेक्षाएँ और देह का डर स्त्री की नींद में सबसे बड़े घुसपैठिए हैं

रत्नेश मिश्र

Book Review
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  'आँखें सूजी
चेहरा पानी था
वज़ूद था कि एक ज़र्बज़दा बूँद
मैंने रोने की तमाम वज़हें दी थीं
तमाम वज़हें दी थीं बिखर जाने की
पर वह थी कि अब भी
जब्तशुदा
बहुत लाचार
बहुत नाकाम
बदन काँपता ही रहा
सदियों से बेहिस आँधियों के थपेड़ों में
माथे पर फेरा दो चार बेबस हाथ
होंठ खोले और बंद किए
और मैं बस इतना ही कह पाया
"इससे अच्छा तो रो लो एक बार." (संग्रह की कविता 'बेहतर है रो लो अब')

 
अनुराधा सिंह मेरी प्रिय समकालीन कवियों में एक हैं। एक पाठक के तौर पर मैं विगत कई वर्षों से उनकी कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। अपनी प्रखर काव्य-दृष्टि और सजग अभिव्यक्ति की पैनी क्षमता के कारण वह वर्तमान कविता-परिदृश्य में एक ताज़ा, ज़िद्दी, जुझारू और अविजित स्वर के तौर पर एक नई तीव्रता के साथ उभरी हैं। मेरी दृष्टि में अपने एकदम भिन्न और साफ़गो तेवर की वज़ह से वह अपने समय और समाज की प्रमुख प्रतिनिधि स्त्री कवयित्री हैं, और अनेक अर्थों में निर्विकल्प भी हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा सद्य प्रकाशित उनका पहला कविता-संग्रह 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' मेरी इस पाठकीय अवधारणा की पुष्टि करता है। इस संग्रह की कविताएँ अपनी भाषिक स्थापनाओं, अंतर्वस्तु की धारदार नव्यता और तरल आनुभूतिक प्रस्तुतियों के कारण अरसे तक हमारी संवेदनाओं को अपनी ज़द में लिए रखती हैं। निश्चित रूप से अपनी पोएटिक इंटेंसिटी की वज़ह से ये विरल कविताएँ हैं।
विज्ञापन

विगत वर्षों में स्त्री-विमर्श के नाम पर हिंदी गद्य और पद्य दोनों में जो कुछ भी लिखा-रचा गया, वह कालांतर में विविध कारणों से किसी न किसी रूप में वैचारिक विचलन का शिकार हो गया। बहुत कम शेष रह पाया जो हमारी स्मृति का एक स्थायी हिस्सा बन पाने में सफल हो सका। अनुराधा सिंह उन गिने-चुने नामों में हैं जिन्होंने इस प्रतिगामी जड़ता को तोड़ने की दिशा में सार्थक और साहसिक पहल की है। 

'जिन्होंने प्रेम और स्त्री पर बहुत लिखा
दरअसल उन्होंने ही किसी स्त्री से प्रेम नहीं किया' (पृष्ठ - 12 ; कविता - लिखने से क्या होता है) 

ये पंक्तियाँ कवि के वैचारिक चयन को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। वह आगे कहती हैं- 

'अब तय करना
किस भाषा में मिलोगे मुझसे
क्योंकि मैं तो व्याकरण से उलट
परिभाषाएं तोड़ कर मिलूँगी (पृष्ठ - 26 ; कविता - स्वागत है नए साल!)।


इन पँक्तियों में कवि का कातर आर्तनाद नहीं सुनाई देता बल्कि मनुष्य के रूप में एक ऐसी चौकस स्त्री के प्रतिरोध की अनुगूँज सुनाई पड़ती है जो अप्रत्यक्ष के पार देखने-सुनने को उद्यत है।

अनुराधा सिंह की कविताओं का अपना एक अलग और विशिष्ट पाठक वर्ग है। हिंदी कविता के लिए यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि यहाँ एक स्त्री कवि की कविताओं को विमर्श-विशेष के तयशुदा जॉनर में धकेल देने की एक समृध्द कुंठित परंपरा रही है। अनुराधा सिंह का कवि अपने भीतर के मनुष्य और स्त्री के साथ-साथ गलबहियाँ डाले चलता है। यह श्रमसाध्य संतुलन उनकी कविताओं में स्पष्ट अनुभूत किया जा सकता है। कहीं किसी तरह की कोई प्रतिस्पर्द्धा नहीं, और न एक-दूसरे को अतिक्रमित करने की कोई आतुर-दुराग्रही प्रबलता ही। कविता-संग्रह का शीर्षक 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' प्रतीक रूप में कवि की पक्षधरता को भी रेखांकित करती है। 

'जिस दिन तिनके बीनना बंद कर दूँ
क्या तब भी माना जाएगा
उर्वर हूँ
बना रही हूँ घोंसला
आने वाली सन्तति के लिए
छुपा सकती हूँ अपने गर्भ में
प्रेम के कोमल रहस्य अब भी....थक जाने पर भी
चलती उड़ती खनखनाती रहती हूँ
डरती हूँ रुक जाने से
शान्त हो जाने से
स्त्रीत्व के सूख जाने से' (पृष्ठ - 14/15 ; कविता - तब भी रहूँगी मैं)।

कुछ लोगों के लिए मुखर हो पाना तभी संभव हो पाता है जब वे अपने भीतर के द्वंद्वों और तर्कों से बेतरह और लगातार जूझते-टकराते रहते हैं। ख़लील ज़िब्रान भी ऐसा ही कुछ मानते हैं। संग्रह की सभी 73 कविताएँ अंततः अनुराधा सिंह के मनुष्य और तत्पश्चात स्त्री होने की उनकी पहचान से ताल्लुक़ रखती हैं और अंततः इन्हीं अंतरद्वंद्वों का हासिल भी हैं।

 'इस नृशंस समय में भी
बचाए रहीं कोख़ हाथ और छाती
क्योंकि रोपनी थी उन्हें रोज़ एक रोटी
उगाना था रोज़ एक मनुष्य
जोतनी थी असभ्यता की पराकाष्ठा तक लहलहाती
सभ्यता की फसल
यूँ तय था उनका बचे रहना सबसे अंत तक' (पृष्ठ - 16 ; कविता - 'बची थीं इसीलिए)।


मिसाल के तौर पर ये पंक्तियाँ भी ग़ौरतलब हैं - 'घोर दुर्भिक्ष में
तुम्हारी किस्म किस्म की भूख का अन्न बनी
दुर्दिन में सुख की स्मृति
वीतराग में विनोद
ऐसे बसने लगी जीवन के एक कोने में तुम्हारी स्त्री' (पृष्ठ -22 ; कविता - क्या चाहते हो स्त्री से)।

तथाकथित नियतिवाद के ख़िलाफ़ दरअसल यह एक विक्षोभपूर्ण अवसाद है जो पुश्त दर पुश्त स्त्री के ज़हन में रिसता हुआ संस्कारित रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है और धरती के अदृश्य कोनों तक पूरी बेनियाज़ी से पसरा हुआ है। निःसन्देह इन कविताओं के रंग बहुत चटक और सुर्ख़ नहीं हैं, पोएटिक पिक्सेल से देखें तो इनके देखने-पढ़ने का सुख-बोध भी रेशम-रेशम सा नहीं है। मेरी पाठकीय दृष्टि में ये दुर्दम्य जिजीविषा, वांछित प्रतिकार और आदिम स्त्री-संघर्ष से संपन्न वे अनुभव हैं जिसे कवि ने हताशा और अवसाद की बजाए अपनी कविताई में चैनलाइज करने की अपेक्षित ज़िम्मेदारी के तौर पर स्वीकार किया है।

हिंदी कविता के परिदृश्य पर स्त्री-स्वर की भाषा में पर्याप्त स्पष्टता और उद्देश्यपरक विश्वसनीयता की अनुपस्थिति में संघर्षशील आबादी के पक्ष में मुखर विरोध की ध्वनि दिन-ब-दिन कुंद होती जा रही है जबकि हमारे भविष्य की सभ्यता का वास्तविक आलम्बन यही है। ऐसे घटाटोप में अनुराधा सिंह के इस संग्रह से होकर गुज़रना इसलिए भी एक पाठकीय ज़रूरत है ताकि अपने इर्दगिर्द के समस्त अनावश्यक वैचारिक मकड़जालों और संभ्रमों को बेध कर हम कविता की दुनिया को देखने-समझने के लिए और उसके प्रति आश्वस्त और आशावान बने रहने के लिए एक पुख़्ता ज़मीन तक पहुँच सकें। 

उनकी कविताओं को एक तयशुदा खांचे में रखना या एक मुख़्तलिफ़ बाइनरी से देखना मुनासिब नहीं होगा। बल्कि उनकी इस दुर्लभता ने इन कविताओं की दृष्टिसंपन्नता में कुछ नया ही जोड़ने का काम किया है। हम सबकी तरह उनका कवि भी इस सांघातिक और फ़रेबी समय का एक सशंकित निवासी है जो समस्त पारम्परिक, भावनात्मक और सांस्थानिक आश्वस्तियों में अपनी आस्थाएं खो चुका है, जिसके अनुभवों ने उसके अंतर की निर्द्वंद्वता और निर्भरता की निष्कलुषता को उसकी नाक के ऐन नीचे से अगवा कर लिया है और, जो प्रेम की निःस्वार्थ पवित्रता से लेकर संविधान में उल्लिखित अधिकारों और सुरक्षाओं को एक संदिग्ध लफ़्फ़ाज़ी भर मानता है। उनकी कविताओं के हर्फ़ दर हर्फ़ में यह चौकन्नापन नज़र आता है। इसकी बानगी इन पंक्तियों में देखी जा सकती है - 

'एक प्रेम का भी निर्माण किया था हमने
वह कहाँ गया भला
क्या तुम्हें भी बुरा लगता है
हमारी साथ-साथ बनाई सृष्टि में
यूँ अकेले-अकेले रहना।' (पृष्ठ - 30 ; कविता - सृष्टि जो हमने रची)।


एक अन्य कविता में वह कहती हैं -

'मैं कहती हूँ
बचा लो यह प्रेम जो दुर्लभ है
इस्पात और कंक्रीट की बनी इस दुनिया में
तुम बचा लेते हो अहम का फौलाद
दो काँच आँखों में एक पत्थर सीने में।' (पृष्ठ - 38 ; कविता - बचा लो)।

आडंबर, निषेधों और शोषण की इस आदिम-संश्लिष्ट-सायास संलिप्तता की समग्र पड़ताल करने के लिए एक पुरुष पाठक को अपने अंतर्मन में शेष बची स्त्री की आँखों से देखना और उसी के मस्तिष्क से सोचना-समझना होगा। इन कविताओं के मूल अन्तरस्वर और तेवर को सही-सही पकड़ पाना तभी संभव हो सकेगा। अनुराधा सिंह विद्रोह की कवि हैं लेकिन अपनी जैविक अस्मिता को लेकर कदाचित वह अतिरिक्त सजग नहीं हैं।

उनकी कविताओं में स्त्री होने की शिक़ायत और अफ़सोस का प्रकटन शायद इसलिए भी अनुपस्थित है। इन कविताओं में न तो रुदन का स्वर है और न ही दृश्य होने वाले अंश्रुकण। लेकिन हो सके तो इनको एक दफ़ा ज़रा छू कर देखिए, ये नम कविताएँ हैं। 

'हालांकि सीना-पिरोना साफ-सफाई और पकाने से
ज़्यादा
अनिवार्य विषय था
अप्रेम में रहना सीखना और सिखाना' (पृष्ठ - 97 ; कविता - अप्रेम)।


प्रकारांतर में यह 'संस्कारित' प्रेम के बहाने दासी बना कर ठगी जाने की शंका से आक्रांत और सचेत कविताएँ हैं।

'निबाहना चाहते थे प्रेम, लड़कियाँ उनसे पूछना ही भूल गईं
लड़कियाँ उन्हीं लड़कों से प्रेम करके घर बसाना चाहती थीं
जो उन्हें प्रेम करके छोड़ देना चाहते थे.'(पृष्ठ - 59 ; कविता - प्रेम का समाजवाद)।

या फिर, 'इन सबसे बड़ा मसला
मेरा उसके प्रेम को हल्के में लेना था
और वह सिरे से 'न' कहना सीख रही थी.' (पृष्ठ - 104 ; कविता - देगची में प्रेम)


जैसे कवितांश इन्हीं आशंकाओं की अभिव्यक्ति हैं।

इस संग्रह की शीर्षक कविता 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' (पृष्ठ - 53) की चर्चा के बिना इस आलेख मैं अधूरा समझता हूँ। इस कविता में 'नींद' एक विलक्षण रूपक की  निर्मिति करती है। इस सियार जैसे लोलुप और घात लगाए समय में 'नींद' स्त्री-जीवन में शांति और चैन की मनःस्थिति बन सकने के बजाए एक आसन्न आखेटक समय के प्रति उसे आगाह करती है। मनुष्य-जीवन में नींद एक निजी स्पेस है जहाँ वह ख़ुद का शारीरिक-मानसिक विरेचन करता है।

अपनी नींद पर इख़्तियार खोने का सीधा मतलब है अपनी ही खुदी और ग़ैरत से बेदख़ल किया जाना। स्त्री-जीवन में नींद एक छलावा है। एक भ्रामक सुख, जो उसे उसकी अस्मिता से अटैच नहीं होने देता। कर्तव्यों की अपेक्षाएँ और देह का डर उसकी नींद में सबसे बड़े घुसपैठिए हैं। अपने समस्त संबंधों में स्त्री एक तुष्ट करने वाला उपकरण मात्र है- देह, ज़रूरत और भावना तीनों ही धरातलों पर।

एक अपेक्षाहीन और सुरक्षित नींद स्त्री-जीवन का संभवतः सबसे बड़ा यूटोपिया है। कवि नींद से मिलने वाली ताज़गी और ऊर्जा की खुराक़ को ईश्वर में तलाशने की अर्थहीन मशक्क़त के ख़िलाफ़ है। ऐसी स्थिति में जब कवि 'सद्दाम हुसैन हमारी आख़िरी उम्मीद था' (पृष्ठ - 49) नाम की कोई कविता लिखती है तो वस्तुतः वह अपनी पूरी पीढ़ी की स्त्रियों के विकल आक्रोश की भोथरी आवाज़ को एक पैनापन दे रही होती है।

ज़रूरत और हक़ दोनों पैमानों पर जब चीज़ें आख़िर में और बची-खुची मिलें तो ज़बान में तल्ख़ी आना न सिर्फ लाज़िम है बल्कि ज़रूरी भी है। कमतरी का यह अहसास इन पंक्तियों में अपनी पूरी त्वरा में प्रकट होता है - 

'दुनिया में हवा पानी कम
बालकनी में धूप कम
गमलों में मिट्टी गुज़ारे लायक
मुझे कम के पक्ष में खड़े रहना पड़ा है अब तक' (पृष्ठ - 110 ; कविता - विरासत)।


स्त्री के संदर्भ में मनुष्य की सभ्यता में अंधकार-समय हमेशा से उपस्थित रहा है। इतिहास की क्रूरतम हिंसाएँ स्त्रियों के विरुद्ध हुई हैं। बस इन हिंसाओं में रक्त के सूख चुके धब्बे हमें कहीं नहीं नज़र आते। ये धब्बे अपनी क्लीषे के बाहर 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' की कविताओं और ऐसी लिखी दूसरी कविताओं में ज़रूर देखे जा सकते हैं। सनद रहे, यह समय और समाज हमें जो ज़िन्दगी 'बख़्श' रहा है वह किल्लत और जिल्लत की ज़िंदगी है, हक़ और इज्ज़त की नहीं।

अनुराधा सिंह की कविताएँ इसी हक़ और गुमान के दरमियान खड़े किए बैरिकेड्स से टकराती हैं। ये खाप-प्रश्नों से जूझती लेकिन शॉपिंग मालों में प्रेतछायाओं की तरह मंडराती स्त्री-जीवन की प्रवंचनाओं का दस्तावेजीकरण करती हैं, और इस उपक्रम में ये दैहिक-वैचारिक-सामाजिक अवशिष्टों का भंडारगृह बनने को अस्वीकार भी करती हैं। अपने भाव-बोध, शिल्प और भाषिक प्रयोग में ये कविताएँ एकदम सधी-कसी हुई हैं। कई कविताएँ अपने अन्तरस्वर मे एक जैसी हैं लेकिन अपने अंकन में वे प्रकार-बहुल हैं। इनकी समसामयिकता में क्षय नहीं दिखता। भाषा की सांद्रता और दृष्टि की स्पष्टता इनको एक कोलाहल बनने से रोकती हैं। ये एक बेचैन मौन की तरह पढ़ने वालों के मन मे अपना स्पेस बनाती हुई उतरती हैं और एक घनीभूत संवेदना की तरह लंबे समय के लिए व्याप जाती हैं।

  prabhatmilind777@gmail.com
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

1 कविता

View Profile

Deepak Sharma

24 कविताएं

View Profile