विज्ञापन

द एपिक सिटीः ये किताब नहीं, कोलकाता के नाम एक प्रेमपत्र है!

काव्य डेस्क

Book Review
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  कुछ किताबें दिल खोलकर लिखी जाती हैं। कुछ किताबें वक्त चुराकर पढ़ी जाती हैं। ‘द एपिक सिटी’ को लेखक ने जितना दिल खोलकर लिखा है, ये किताब पाठक से भी उतना ही वक्त चुराकर पढ़े जाने की मांग करती है। आपका कोलकाता से कोई रिश्ता हो या न हो, आप कभी कोलकाता गए हों या न गए हों, फिर भी इसके एक-दो पन्ने पढ़ने के बाद इसमें सिलसिलेवार तरीके से ऐसा बहुत कुछ मिलता जाता है,

जिसे पढ़े बिना छोड़ा नहीं जा सकता। कोई इसे जनरल नॉलेज बढ़ाने के लालच में पढ़ सकता है, तो कोई एक शहर को समझने के लिए। दोनों ही मामलों में लेखक की कथनी तारीफ के काबिल हंै। कुशनावा चौधरी ने जितनी बारीकी से कोलकाता को देखा है, उतनी ही खूबसूरती से लिखा भी है।

किताब पढ़ने के बाद समझ आता है कि कुछ लोग इसे प्यार करते हैं और कुछ लोग नफरत करते हैं। लेकिन ऐसे कम ही लोग होंगे, जो इस शहर को अच्छी तरह जानते हैं। इससे पहले भी कोलकाता के बारे में कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। इनमें जियोफ्रे मूरहाउस की ‘कैलकटा’ से लेकर अमित चौधरी की ‘टू ईयर्स इन द सिटी’ तक शामिल हैं। लेकिन यह किताब इन सबमें खास है। 
विज्ञापन

कुशनावा चौधरी ने अपने बचपन का कुछ समय कोलकाता में बिताया है। 12 साल की उम्र में वह न्यूजर्सी चले गए, लेकिन इसके बाद फिर से उन्होंने अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया और कोलकाता आ पहुंचे। यहां आकर उन्होंने देखा कि सालों बीतने के बाद भी उनके बचपन की गलियां वैसी ही हैं, जैसी वो छोड़कर गए थे। यहां उन्होंने ‘द स्टेटसमैन’ में एक सिटी रिपोर्टर के तौर पर काम भी किया।

कोलकाता में बिताए बचपन और बड़े होकर उसे देखने समझने के अपने अनुभवों को कुशनावा ने 14 अध्यायों में बांटा है। किताब के मुताबिक, कोलकाता से जुड़े ज्यादातर लोग अब इसे छोड़कर जा चुके हैं। कुछ यहां से जाने की तैयारी में हैं, मगर अब भी 15 मिलियन लोग कोलकाता में रहते हैं। किताब के बहाने कुशनावा ने शब्दों के जरिए कोलकाता का एक खूबसूरत पोट्रैट तैयार किया है।

कुछ किस्से ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर हंसी आती है, तो कुछ ऐसे कि जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है। किताब में कई जगह खुद कुशनावा ने ऐसे किस्से बताए हैं, जिनसे लगता है कि कोलकाता में रहना आसान नहीं है। कई जगह ऐसी बातों का जिक्र है, जिनसे साफ संदेश मिलता है कि कोलकाता एक ऐसा शहर है, जिसके अच्छे दिन बीत चुके हैं और अब किसी तरह की कोई उम्मीद नहीं बची है।

इस शहर को उन्होंने रिटायरमेंट होम तक कहा है। मगर इसी शहर में सत्यजीत रे, टेगौर और बंगाली कवियों की वो यादें भी हैं, जो सिर्फ कोलकाता के लिए ही नहीं, देश-दुनिया के लिए मिसाल हैं।  ये वो जगह भी हैं, जहां आज भी लोग इंटरनेट में सिर घुसाए नहीं, आपस में बातें करते नजर आते हैं।

किसी भी जगह पता पूछने पर आज भी यहां दर्जन भर लोग रास्ता बताने आ जाते हैं। ऐसे समय में जब पढ़े-लिखे बंगाली लोग भारत छोड़कर विदेश में बसने की तैयारी कर रहे हैं या जाकर बस चुके हैं, तब चौधरी ने उलटा रास्ता पकड़कर अपनी जड़ों की ओर लौटना ज्यादा बेहतर समझा। इसका नतीजा जो इस किताब के रूप में सामने आया है, तो इसे घाटे का सौदा नहीं कहा जा सकता है।

किताब- द एपिक सिटी: द वर्ल्ड ऑन द स्ट्रीट्स ऑफ कोलकाता
लेखक - कुशनावा चौधरी
प्रकाशन - ब्लूम्सबरी पब्लिकेशन
मूल्य - 1009 रुपये
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all