जम्मू। पीओजेके विस्थापित पीओजेके के वास्तविक हितधारक हैं। वे 1947 में जम्मू-कश्मीर की रियासत पर पाकिस्तान की आक्रामकता का पहला शिकार हुए। 22 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की रियासत पर हमला किया और भिम्बर, कोटली, देवा, बटाला, मुजफ्फराबाद, मीरपुर, पुंछ, राजोरी आदि क्षेत्रों को तबाह कर दिया और उस पर अवैध नियंत्रण कर लिया। पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले इस क्षेत्र को ‘पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके)’ के रूप में जाना जाता है। इस हमले के परिणामस्वरूप सिखों और हिंदुओं का नरसंहार हुआ, उनके घरों और संपत्ति को जला दिया गया, महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया गया। इस सांप्रदायिक हिंसा ने सिखों और हिंदुओं को जम्मू और अन्य राज्यों में पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया। यह बात सीएलजेकेएस के अकादमिक समन्वयक अजय कुमार शर्मा ने कही। वह सेंटर फॉर लद्दाख एंड जम्मू एंड कश्मीर स्टडीज की तरफ से संकल्प दिवस की पूर्व संध्या पर पीओजेके के विस्थापितों पर आयोजित वेबिनार में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों से विस्थापित हुए लोगों को पीओजेके विस्थापित कहा जाता है। एक बार विस्थापित होने के बाद सात दशक बाद भी वे अपने वतन नहीं लौट सके। भारत सरकार ने उन विस्थापित व्यक्तियों को कुछ राहत और नकद सहायता प्रदान की है जिनका जम्मू में पुनर्वास किया गया था, लेकिन जिन्हें अन्य राज्यों में पुनर्वासित किया गया था, उन्हें ऐसे सभी लाभों से वंचित कर दिया गया था। विस्थापन के परिणामस्वरूप यह समाज सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर आ गया है। 5 अगस्त, 2019 के बाद ही यह संभव हुआ कि उनके पंजीकरण और अधिवास प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
डॉ. दीपक कपूर ने 1947 में मुजफ्फराबाद के निर्दोष हिंदुओं और सिखों पर किए गए अत्याचारों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कैसे मुजफ्फराबाद के लोगों ने 1947 में आक्रमणकारियों से लड़ाई लड़ी और अपनी महिलाओं और लोगों को बचाने के लिए बलिदान दिया। हमने बहुत कुछ सहा है, लेकिन आज हम वर्तमान सरकार से आशा की किरण देख रहे हैं और दृढ़ विश्वास है कि हम जल्द ही पीओजेके में अपने क्षेत्र में वापस जाएंगे। हम अपने विस्थापन के बाद से ही मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के शिकार रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर से बाहर बसे विस्थापित पैकेज से वंचित
पं. अशोक खजूरिया ने कहा कि पीओजेके विस्थापितों के कुल 31619 परिवारों को 1962 में अनुग्रह राशि के लिए पंजीकृत किया गया था और 9500 परिवारों को विभिन्न कारणों से खारिज नहीं किया गया था, लेकिन विस्थापित परिवारों की वास्तविक संख्या लगभग 50000 थी। वर्तमान में ऐसे परिवारों की संख्या 150000 तक बढ़ा गई है जिसमें 600000 लोग जम्मू संभाग के दस जिलों में बसें हुए हैं। अभी भी वे उन शिविरों में रह रहे हैं जो 1950 के दशक में पीओजेके विस्थापितों के लिए स्थापित किए गए थे, लेकिन आज तक उनके पास स्वामित्व अधिकार नहीं हैं। वाजपेयी सरकार के दौरान उन्हें कुछ वित्तीय सहायता प्रदान की गई थी और फिर से मोदी सरकार में रुपये की वित्तीय राहत प्रदान की गई थी। जम्मू और कश्मीर में बसे पीओजेके प्रति विस्थापित परिवार को 5.5 लाख रुपए का पैकेज प्रदान किया गया। लेकिन दुर्भाग्य से जम्मू-कश्मीर के बाहर बसे पीओजेके विस्थापित व्यक्तियों को ऐसे सभी लाभों और सहायता से वंचित कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओजेके विस्थापितों के लिए 24 सीटें आरक्षित हैं। सभी विस्थापितों ने स्पष्ट रूप से मांग की कि उनके मुद्दों को संबोधित करने के लिए उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए 1/3 सीटें आरक्षित की जानी चाहिएं।
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर रहा समुदाय
अरुण चौधरी ने बताया कि 25 नवंबर 1947 की भयानक रात को पाकिस्तानी सेना ने मीरपुर पर हमला किया और हजारों निर्दोष लोगों को मार डाला। अलीबेग गुरुद्वारे में लगभग 5000 महिलाओं और लड़कियों का अपहरण कर लिया गया। पाकिस्तानी सैनिकों ने कई युवाओं को मार डाला। समय के साथ हमारे समुदाय को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा गया है। समय के साथ हम अपनी संस्कृति और भाषा को काफी हद तक खो चुके हैं।
सत्र की अध्यक्षता डॉ. वीरेंद्र कौंडल ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण को पढ़ा। उन्होंने कहा कि ये विस्थापित व्यक्ति जम्मू-कश्मीर के असली शिकार और पीओजेके के हितधारक हैं। उन्होंने कहा कि लद्दाख और जम्मू-कश्मीर केंद्र इस संबंध में गहन शोध कर रहा है लेकिन पीओजेके के मुद्दे और समस्याएं विश्वविद्यालयों में अकादमिक चर्चा का विषय नहीं बन सकीं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को भविष्य में भी इस तरह के शैक्षणिक कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए। वेबिनार की कार्यवाही का संचालन जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. अजय कुमार सिंह ने किया। औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन अधिवक्ता अखिल वर्मा ने किया।