दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में भूचाल आ गया है। आजाद के प्रदेश के समर्थकों की शनिवार को दिल्ली में बैठक प्रस्तावित है। अगले महीने सितंबर में उनके जम्मू-कश्मीर आने की संभावना है। आजाद नई पार्टी के गठन की घोषणा कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो सबसे अधिक प्रभाव कश्मीर आधारित पार्टियों पर पड़ने के आसार हैं।
आजाद के इस्तीफे के बाद पार्टी डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। पार्टी से आजाद के इस्तीफे के तत्काल बाद जम्मू स्थित पार्टी मुख्यालय में हुई बैठक में पूरी स्थिति पर चर्चा की गई। सूत्रों ने बताया कि आजाद समर्थकों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने और उनके बीच जाकर माहौल को साजगार बनाने पर रणनीति बनाई गई। कहा गया कि उन सभी लोगों से ज्यादा से ज्यादा संपर्क बनाया जाए जो आजाद के समर्थक माने जाते हैं। खासकर चिनाब वैली, राजोरी, पुंछ और कश्मीर में।
जम्मू। यों तो दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद का पूरे जम्मू-कश्मीर में सम्मान है और लोगों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन चिनाब वैली में उनका खासा असर है। डोडा, किश्तवाड़ व रामबन जिलों में उनका जबर्दस्त प्रभाव है। पहाड़ी इलाकों में भी उनकी पैठ रही है। यही वजह है कि चिनाब वैली में लंबे समय तक कांग्रेस की मजबूत किलेबंदी रही। घाटी के भी कुछ हिस्सों में उनके समर्थकों की कमी नहीं है। माना जा रहा है कि पूरे प्रदेश की 20 से 25 सीटों पर उनका जबर्दस्त असर है।
ऐसे में चिनाब वैली और घाटी की राजनीति करवट ले सकती है। आजाद के कांग्रेस से अलग होने का पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। खासकर चिनाब वैली और घाटी में। ब्लॉक कांग्रेस से लेकर यूथ कांग्रेस और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तक सक्रिय राजनीति में उन्होंने लोगों को जोड़ा। सभी धर्मों और सभी वर्गों के बीच उनकी पकड़ थी।