कांग्रेस छोड़ चुके दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद के अगले कदम पर न केवल कांग्रेस बल्कि अन्य पार्टियों की भी नजर है। जम्मू-कश्मीर के साथ ही देश-दुनिया खासकर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान व चीन भी नजरें गड़ाए हुए है। लोग यह देखना चाहते हैं कि पांच दशक तक कांग्रेस का दामन थामने वाले आजाद अब कौन सा कदम उठाते हैं।
उन्हें जम्मू-कश्मीर और देशभर में कितना समर्थन मिल पाता है। चूंकि, जम्मू-कश्मीर हमेशा से सुर्खियों में रहा है। पाकिस्तान व चीन के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ, तमाम मानवाधिकार संगठनों की ओर से लगातार यहां की गतिविधियों पर नजर रहती है। ऐसे में आजाद के कदम का यहां की राजनीति पर क्या असर होगा, किसे फायदा और किसे नुकसान होगा।
इसके आकलन में अभी से सारे जुट गए हैं। लेकिन असल काम तो यदि आजाद ने नई पार्टी बनाई तब शुरू होगा। माना यह जा रहा है कि आजाद अपने समर्थकों तथा जम्मू-कश्मीर की जनता से बातचीत कर नई पार्टी के संबंध में फैसला ले सकते हैं।
डेढ़ साल पहले लिखी जा चुकी थी पार्टी से किनारा कसने की पटकथा
गुलाम नबी आजाद के पार्टी से किनारा कसने की पटकथा लगभग डेढ़ साल पहले यानी जनवरी 2021 में ही लिखी जा चुकी थी। राज्यसभा से विदाई के दौरान उनका भावुक होना तथा प्रधानमंत्री मोदी की ओर से उनकी तारीफों के कसीदे पढ़ने, पद्मभूषण सम्मान मिलने के साथ ही यह कहा जाने लगा था कि आजाद की अगली पारी अब भाजपा के साथ हो सकती है। हालांकि, उनके भाजपा में न जाने के पीछे कई वजहें भी हैं।
खांटी कांग्रेसी आजाद जम्मू-कश्मीर से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक में अपना कद बना चुके थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से वे अपने को असहज महसूस कर रहे थे। राज्यसभा से विदाई के बाद तो उन्होंने जी-23 नेताओं को जम्मू में जुटाकर शक्ति भी प्रदर्शित किया।
तभी यह माना जा रहा था कि इस शक्ति प्रदर्शन के जरिये वे नई पार्टी का ऐलान कर सकते हैं। लेकिन सब कुछ चलता रहा। जानकार बताते हैं कि भाजपा में न जाने के पीछे उनका पांच दशक तक कांग्रेसी विचारधारा को आत्मसात करने का है, जो उनके खून में रच बस गया है।
दूसरा अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि तथा हिंदू व मुस्लिमों के बीच समान रूप से स्वीकार्य आजाद के भाजपाई के रूप में स्वीकार न किए जाने का भी खतरा रहा। तीसरा भाजपा में 73 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को सक्रिय राजनीति की बजाय मार्गदर्शक मंडल में रखा जाना है।