बिहार की राजनीति में हर विधानसभा का एक अलग महत्व है। इस साल के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसे लेकर बिहार में राजनीति गर्म है। आने वाले दिनों में सत्ता किसके पास जाती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस चुनावी हलचल के बीच बिहार चुनाव से जुड़ी हमारी खास सीरीज 'सीट का समीकरण' में आज हम आपको केसरिया सीट के बारे में बताने जा रहे हैं।
पहले जानते है केसरिया सीट के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक पूर्वी चंपारण जिला भी है। जिले में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं। केसरिया विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र पूर्वी चंपारण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। 1971 तक केसरिया नाम से भी लोकसभा सीट भी हुआ करती थी। केसरिया विधानसभा क्षेत्र पूर्वी चंपारण लोकसभा में आता है। 2008 परिसीमन से पहले इसे मोतिहारी लोकसभा सीट के नाम से जाना जाता था। पूर्वी चंपारण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में कुल छह विधानसभा सीटें आती है जिसमें हरसिद्धि (एससी), गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मोतिहारी विधानसभा सीटें शामिल हैं। इस सीट पर 1952 में सबसे पहले चुनाव हुए थे।
पहली बार कांग्रेस को मिली जीत
1952 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस की प्रभावती गुप्ता को जीत मिली थी। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के अवधेस प्रसाद सिन्हा को 6299 वोट से हरा दिया था।
1957 में एक बार फिर कांग्रेस की प्रभावती ने यह चुनाव जीत लिया था। लेकिन इस बार जीत बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी। प्रभावती ने भाकपा के पीतांबर सिंह को 170 वोट से हरा दिया था।
भाकपा को मिली जीत
1962 में एक बार फिर मुकाबला पीतांबर सिंह और प्रभावती गुप्ता के बीच में ही था। भाकपा के पीतांबर सिंह ने इस बार जीत दर्ज कर ली। भाकपा ने कांग्रेस की प्रभावती गुप्ता को 6039 वोट से हरा दिया था।
1967 में एक बार फिर भाकपा के पीतांबर सिन्हा ने कांग्रेस के एम. प्रसाद को 2389 वोट से हरा दिया था।
कांग्रेस को सीट पर वापसी का मौका
1969 में एक बार फिर कांग्रेस को सीट पर वापसी का मौका मिला था। कांग्रेस के मोहम्मद एज़ाज हुसैन खान ने भाकपा के पीतांबर सिंह को 2536 वोट से हरा दिया था।
पीतांबर को फिर मिला वापसी का मौका
1972 में एक बार फिर से सीट पर भाकपा के पीतांबर सिंह ने जीत दर्ज कर ली थी। उन्होंने कांग्रेस के एजाज हुसैन खान को 6697 वोट से हरा दिया था।
1977 में फिर से भाकपा के पीतांबर सिंह ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने इस बार जनता पार्टी के राय हरिशंकर शर्मा को 6382 वोट से हरा दिया था।
1980 में जनता पार्टी को जीत
1980 में जनता पार्टी के राय हरिशंकर शर्मा को पहली बार जीत मिली थी। उन्होंने कांग्रेस आई के लक्ष्मण सिंह को 1884 वोट से हरा दिया था।
1985 में एक बार फिर से राय हरि शंकर शर्मा को जीत मिली। लेकिन इस बार वह पार्टी बदलकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। उन्होंने भाकपा के यमुना यादव को 6638 वोट से हरा दिया था।
भाकपा को फिर मिली जीत
1990 में भाकपा ने इस सीट पर वापसी की और पिछली बार हारे यमुना यादव को इस बार जीत मिली। उन्होंने इस बार दूसरी बार पार्टी बदलकर भाजपा से चुनाव लड़ रहे राय हरि शंकर शर्मा को 19766 वोट से हरा दिया था।
1995 में भाकपा के यमुना यादव ने एक बार फिर इस सीट पर जीत दर्ज की। उन्होंने भारतीय प्रगतिशील पार्टी किरण शुक्ला को 25204 वोट से हरा दिया था।
समता पार्टी को मिली जीत
2000 में इस सीट पर समता पार्टी को जीत मिली थी। समता पार्टी के ओबैदुल्ला ने कोसल पार्टी के यमुना यादव को 29319 वोट से हरा दिया था।
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। जिसमें पहले चुनाव में जदयू के ओबैदुल्ला ने राजद के राजेश कुमार रौशन उर्फ बबलु देव को 8948 वोट से हरा दिया था।
राजद को मिली पहली जीत
2005 फरवरी में दूसरी बार चुनाव हुए इसमें राजद को पहली जीत मिली। राजद के राजेश कुमार रौशन उर्फ़ बब्लू देव ने जदयू की रजिया खातून को 978 वोट से दिया था।
2010 में भाजपा को पहली जीत
2010 में इस सीट पर भाजपा के सचिन्द्र प्रसाद सिंह को पहली बार जीत मिली थी। उन्होंने भाकपा के रामसरन प्रसाद यादव को 11683 वोट से हरा दिया था।
2015 में राजद को मिली जीत
2015 में एक बार राजद को सीट पर जीत मिली थी। राजद के डॉ. राजेश कुमार ने भाजपा के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता को 15947 वोट से हरा दिया था।
2020 में जदयू को मिली जीत
2020 में सीट पर जदयू की शालिनी मिश्रा को जीत मिली थी। जदयू की शालिनी मिश्रा ने राजद के संतोष कुशवाह को 9227 वोट से हरा दिया था। शालिनी मिश्रा पूर्व सांसद कमला मिश्र मधुकर की बेटी है। उन्होंने 2020 में जदयू की सदस्या ग्रहण की थी। संतोष कुशवाहा 2024 में राजद को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे।
सीट का समीकरण सीरीज की सभी खबरें यहां पढ़ें