Brother and sister who returned from Ukraine narrated the story and everyone was surprised
- फोटो : Yamuna Nagar
यमुनानगर। फर्कपुर के वार्ड 18 स्थित जवाहर नगर में रहने वाले कर्ण यादव व उनकी बहन पूजा यादव शुक्रवार देर रात अपने घर लौट आई। घर लौटकर जब उन्होंने परिजनों को आपबीती व यूक्रेन के हालात से अवगत कराया तो सब हैरान रह गए। दोनों बच्चे घर पहुंचे तो परिजनों ने उन्हें गले से लगा दिया। आसपास के लोग भी उनका हाल जानने के लिए घर पहुंच रहे हैं। भाजपा जिला सचिव एवं पूर्व पार्षद कर्मवीर गोंदवाल, मंडल अध्यक्ष महेंद्र सिंह फौजी, नरेंद्र लाडी, कुलविंद्र शिंगारी, उमेश यादव, अशोक व रोशन लाल भाई-बहन से मिलने पहुंचे।
कीव से कर रहे थे एमबीबीएस
कर्ण यादव व उनकी पूजा यादव दोनों यूक्रेन की राजधानी कीव की बोगोमोलेट्स नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस करने गए थे। कर्ण का यह पहला साल था जबकि बेटी तीन साल पहले गई थी। दोनों यूक्रेन से स्लोवाकिया के बॉर्डर पर पहुंचे थे। जहां वह दो दिन तक भारतीय बेस कैंप में रहे और तीसरे दिन उन्हें भारत के लिए प्लेन मिला। उनके पिता रवि यादव रेलवे में डिप्टी सीटीआई हैं, जो उन्हें लेने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पर गए।
कर्ण व पूजा यादव ने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा डर इसलिए लग रहा था क्योंकि वह यूक्रेन की राजधानी में थे। सबसे पहले हमला वहीं पर हुआ था। हालांकि जिस हॉस्टल में वह थे उस पर हमला नहीं हुआ। परंतु ऐसा कोई दिन नहीं गया जब उनके कुछ किलोमीटर के क्षेत्र में गोलाबारी न हुई हो। धमाकों की वजह से वह एक मिनट भी चैन से सो नहीं पाए। वह दोनों पहले अलग-अलग हॉस्टल में थे। परंतु जब हमला तेज हो गया और लोगों में भगदड़ मचने लगी तो वह एक ही हॉस्टल में आ गए थे। हॉस्टल में तब करीब 900 विद्यार्थी आ चुके थे। जब हमले और भी तेज हुए तो वह हॉस्टल से कुछ दूर पर बंकर में चले गए। तीन-चार दिन वह बेसमेंट में ही रहे। फिर वहां भारतीय दूतावास से मैसेज आया कि सुबह 10 बजे उनकी ट्रेन निकलेगी इसलिए वह आठ बजे कीव के रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाए।
सड़कों के किनारे देखी लोगों की लाशें
उन्होंने बताया कि सुबह जब वह स्टेशन के लिए निकले तो उन्हें रास्ते में कोई वाहन नहीं मिला। चार किलोमीटर का सफर पैदल तय कर वह स्टेशन पहुंचे। रास्ते का मंजर देखकर वह हैरान रह गए। गोलाबारी में मरे लोगों के शव सड़क किनारे पड़े थे। 10 बजे ट्रेन आनी थी लेकिन वह रद्द हो गई। इसके बाद अगली ट्रेन दोपहर दो बजे मिली। ट्रेन से वह लवीव पहुंचे। वहां पहुंचने पर पता चला कि पोलैंड, रोमानिया व हंगरी के बार्डर पर लोगों की बहुत भीड़ है। पता चला कि स्लोवाकिया बॉर्डर पर भीड़ कम है। वहां से भारतीय बेस कैंप में जल्दी पहुंच सकते हैं। कर्ण व पूजा ने बताया कि बेस कैंप में भारत सरकार की तरफ से चाय, भोजन व स्नैक्स का प्रबंध किया गया। लड़कियों को कमरे उपलब्ध कराए गए। एक कमरे में तीन लड़कियों को रख गया। वहां दो दिन रहे। तीसरे दिन फ्लाइट मिली। उनके पिता रवि यादव, मां अंजू यादव व दादी कमला देवी ने बताया कि बच्चों को घर देखकर वह खुश हैं। भारत सरकार ने बच्चों को घर लाने में जो मदद की है उसकी जितनी सराहना की जाए वह कम है।