गांव भराण के जयदेव राठी के अनुसार देशभर में डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस, सेना अधिकारी व अन्य क्षेत्रों में बेहतर भविष्य बनाने का संघर्ष विद्यार्थियों को कोचिंग संस्थानों की ओर धकेल रहा है। जहां लाखों युवा अपने भविष्य के सपने बुनने की सोच लेकर जाते हैं। जब ये सपने अधूरे रह जाते हैं तो विद्यार्थी अंदर से टूटने के साथ मायूस हो जाते हैं।
यही अकेलापन उन्हें अवसाद में ले जाता है। सरकार को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए। कोचिंग सेंटरों पर नजर रखने के साथ समय-समय पर इनकी जांच की जानी चाहिए। मनोचिकित्सक से राय लेकर विद्यार्थी हित में विचार विमर्श करना चाहिए।
आज के समय में देश में हर छोटे और बड़े शहर में कोचिंग संस्थान खुले हुए हैं। इन कोचिंग संस्थानों में इंजीनियर, डॉक्टर और नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाई जाती है। देश में सबसे ज्यादा कोचिंग संस्थान राजस्थान के कोटा में खुले हुए हैं। जहां लाखों युवा अपने भविष्य के सपने बुनने और सपनों की उड़ान लेकर जाते हैं कि हम डॉक्टर और इंजीनियर बनकर ही लौटेंगे। लेकिन, जब उनके सपने पूरे नहीं हो पाते तो छात्र अंदर से टूट जाते हैं और अवसाद में चले जाते हैं। वह किसी को कुछ कह भी नहीं पाते, क्योंकि उन्हें अपने परिजनों व परिचितों से ताने सुनने को मिलते हैं। इसी डर के कारण कि कोन क्या कहेगा? किसी को अपनी परेशानी बताने की बजाय आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं।
अभी हाल ही में कोटा में 19 वर्षीय लड़की ने इंजीनियर नहीं बन पाने के कारण आत्महत्या कर ली। उसने अपने और अभिभावकों का सपना पूरा नहीं होने के कारण आत्महत्या की बात सुसाइड नोट में लिखी है। इस साल एक महीने के अंदर तीन बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले साल लगभग 26 छात्रों ने आत्महत्या की थी। यह हाल सिर्फ अकेले राजस्थान के कोटा का नहीं है। देश में इस तरह की आत्महत्याओं की घटनाएं हर शहर में बढ़ती जा रही हैं।
छात्र इसलिए आत्महत्या कर रहे हैं कि वह अपने सपनों की उड़ान पूरी नहीं कर सके। वह अपनी जिंदगी में हार मान चुके होते हैं। कोई भी इंसान इतना बड़ा कदम तब उठता है, जब उसका अपने आप से विश्वास उठ जाता है। उसे लगता है कि जिंदगी में अब सब खत्म हो गया है। छात्र देश का भविष्य हैं। वह सपनों के मकड़जाल में उलझ कर अपनी जान खपा रहे हैं। राजस्थान ही नहीं पूरे देश में भी इस तरह की घटनाएं एक तरह से आम बात हो गई है। पिछले साल ही चेन्नई में डॉक्टर ना बन पाने के कारण 19 वर्षीय युवा ने आत्महत्या कर ली उसके दुख में उसके पिता ने भी आत्महत्या कर ली थी।
पहले 30 होते थे अब 15 छात्र ही हो रहे कामयाब
राजस्थान का कोटा शिक्षा का हब बन चुका है। जहां 150 से ज्यादा कोचिंग सेंटर हैं। कई कोचिंग सेंटर तो ऐसे हैं, जहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या हजारों में है। वहीं आत्महत्या करने वाले छात्रों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। आत्महत्या का एक कारण यह भी है कि पहले जहां 100 में से 30 बच्चे कामयाब होते थे। वहीं अब 100 में से सिर्फ 15 ही छात्र कामयाबी के मंजिल तक पहुंच पाते हैं। इसका मुख्य कारण है शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है।
न कोचिंग सेंटर गंभीर और न सरकार
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर छात्र आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? इन घटनाओं पर न तो कोचिंग संस्थान संचालकों ने गंभीरता से विचार किया है और न ही सरकार। अभिभावकों ने भी शायद ही सोच विचार और चिंतन मनन किया हाे। इन आत्महत्याओं में सबसे बड़ा कारण मुझे कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनके खुद के अपने अभिभावक ही होते हैं, जो जबरदस्ती उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के चक्कर में मौत के मुंह में धकेल रहे हैं।
देश में डॉक्टर, इंजीनियर बनने की चल रही भेड़चाल
आज हमारे देश में डॉक्टर इंजीनियर बनने की एक भेड़ चाल चल पड़ी है। हर माता-पिता अपने बच्चों के मना करने के बावजूद जबरदस्ती उन्हें डॉक्टर इंजीनियर बनाना चाहता है। उनके ऊपर जबरदस्ती डॉक्टर इंजीनियर बनने की पढ़ाई थोप दी जाती है। जब वह बच्चे अपने माता-पिता के सपनों को साकार करने में नाकाम हो जाते हैं तब उनके सामने आत्महत्या के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता है।
व्यापार का रूप ले चुके कोचिंग संस्थान
कोचिंग संस्थान बड़े-बड़े सपने दिखाकर अभिभावकों और बच्चों को फंसाने का काम करते हैं। लेकिन, हम समझ नहीं पा रहे हैं कि लाखों की संख्या में बच्चों को ये कोचिंग संस्थान कैसे फंसा सकते हैं। कोचिंग संस्थानों ने आज व्यापार का रूप ले लिया है। और व्यापार का काम होता है लोकलुभावने विज्ञापन दिखाकर फंसना होता है। जिस तरह से टेलीविजन में तरह-तरह के लोक लुभावने विज्ञापन दिखाकर लोगों को लूटने का काम कंपनियों की ओर से किया जाता है। इन लोक लुभावने विज्ञापनों के जाल में फंसने से बचना होगा। इसी तरह कोचिंग संस्थान भी लोक लुभावने विज्ञापनों में उलझाकर हमें लूट रहे हैं।
साप्ताहिक टेस्ट से शुरू होती है परेशानी
कोचिंग संस्थान अपने यहां साप्ताहिक टेस्ट लेते हैं। इससे छात्रों में घबराहट होती है। परिणाम खराब व उनके अनुरूप नहीं आने के कारण छात्रों की कोचिंग संस्थान में उच्च श्रेणी अलग से बनाई जाती है। मध्यम श्रेणी अलग से बनाई जाती है जो उच्च श्रेणी के छात्र हैं, उन पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। माध्यम श्रेणी के छात्रों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। इससे परिणाम खराब आने वाले छात्र अवसाद में चले जाते हैं। आगे चलकर वे आत्महत्या कर लेते हैं। कोटा में पढ़ने वाले 95 प्रतिशत छात्र मध्यम वर्गीय परिवारों से होते हैं। ये परिवार अपना पेट काटकर पैसे बचाते हैं। कुछ किसान परिवार अपनी जमीन बेचकर बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर बनना चाहते हैं। वही सब असफल होते हैं तो उनके सपने चूरचूर हो जाते हैं। अब समझने वाली बात यह है कि हम सब इन आत्महत्याओं को क्यों नहीं रोक पा रहे हैं?
समाधान : एक साथ मिलकर सबको देना होगा ध्यान
आत्महत्या रोकने का काम अकेले कोचिंग संस्थान नहीं कर सकते। यह काम सबको साथ मिलकर करना होगा। उसमें सरकार से लेकर अभिभावकों को इस विषय में चिंतन मनन करना होगा। सभी बातों को सोचना होगा कि वह अपने बच्चों पर जबरदस्ती से पढ़ाई को ना थोपें, बल्कि उसकी इच्छा के अनुसार पढ़ाई करने दी जानी चाहिए। अभिभावकों को भी सोचना होगा कि इससे अलग भी बहुत कुछ है जिंदगी में करने के लिए। कला, फौज, रेलवे, पत्रकारिता, अन्य सिविल सर्विस की नौकरियां बहुत से ऐसे रास्ते हैं, जो बच्चे देश का भविष्य संवार सकते हैं। आज के युवा देश का भविष्य हैं, उनको देश की सेवा करने के बारे में प्रेरित करना चाहिए। डॉक्टर इंजीनियर की पढ़ाई छोड़कर अपने बच्चों को अपनी इच्छा के अनुसार पढ़ाई करने दी जानी चाहिए। इसके अलावा कोचिंग संस्थानों को समय-समय पर छात्रों की मनोचिकित्सा जांच करानी चाहिए और छात्रों में हीन भावना नहीं पनपने देनी चाहिए। दूसरी तरफ कोचिंग सेंटरों काे साप्ताहिक टेस्ट की बजाय महीने में एक बार टेस्ट लेना चाहिए, ताकि बच्चों में हीन भावना उत्पन्न न हो। साप्ताहिक टेस्ट लेने से कम नंबर आने पर वह छात्र अगले हफ्ते की पढ़ाई अच्छी तरह से नहीं कर पाते हैं। वहीं सरकार को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए। सरकार को समय-समय पर कोचिंग संस्थानों की जांच और कैंप लगाकर छात्रों की मनोचिकित्सा जानकारी हासिल करनी चाहिए। विशेषज्ञों से राय लेकर विचार विमर्श करना चाहिए, जिससे छात्र अवसाद और हीन भावना में न आने पाएं। छात्रों को समझना चाहिए कि अगर आप डॉक्टर इंजीनियर नहीं बन पाते हैं तो इससे आगे जिंदगी में बहुत से रास्ते हैं, जिनमें जाकर कामयाब इंसान बन सकते हैं।
विशेषज्ञ की राय
प्रतिभागी युवाओं ने बेहतर लेख दिए हैं। युवाओं ने लगभग हर पहलू छूने का प्रयास किया है। बेहतर प्रतिभागी रहे जयदेव राठी ने सभी बिंदुओं को छुआ है। इसमें विद्यार्थियों के तनाव व उसकी वजह दर्शाने के साथ सुझाव व समाधान भी देने का प्रयास किया है। विद्यार्थियों में इस तरह के लेखन प्रयास से प्रतिभा का निखार आता है। इसलिए यह आयोजन बेहतर है। -प्रो. सर्वदीप कोहली, अध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, एमडीयू।