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भाषा ही नहीं संस्कृति के प्राणों में समाहित मूल तत्व है संस्कृत

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माई सिटी रिपोर्टर
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करनाल। संस्कृत केवल भाषा ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति के प्राणों में समाहित मूल तत्व है। यह बात संस्कृत से जुड़े देश और विदेश के प्राध्यापकों ने पंडित चिरंजीलाल शर्मा राजकीय पीजी कॉलेज के संस्कृत विभाग एवं हरियाणा संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कही।
संस्कृत शिक्षण की विभिन्न कलाएं विषय पर हुए वेबीनार की अध्यक्षता अकादमी के निदेशक डॉ. दिनेश शास्त्री और कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. राजेश रानी ने की। वहीं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजेश्वर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने कहा कि संस्कृत प्राचीन और समृद्ध भाषा है। संस्कृत भाषा के शिक्षण में प्राचीन और नूतन शिक्षण विधियों का प्रयोग करके इसे और अधिक समृद्ध बनाया जा सकता है।
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शासकीय स्वशासी महाविद्यालय छत्तीसगढ़ से डॉ. दिव्या देशपांडे ने कहा कि संस्कृत भाषा क्लिष्ठ व कर्मकांड और शास्त्रों की भाषा है। संस्कृत शिक्षक को नव तकनीकी पद्धतियों के माध्यम से अधिक रुचिकर बनाकर इस भ्रांति को दूर करना चाहिए। अकादमी के निदेशक डॉ. दिनेश शास्त्री ने कहा कि सरकार संस्कृत अकादमी के सहयोग से संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए कृत संकल्प है। कार्यक्रम में संयोजिका सरिता आर्य, संजीव कुमार, उप प्राचार्य डॉ. निर्मल अत्री और डॉ. रेखा त्यागी ने विचार रखे। इस अवसर पर महेंद्र बागी, सुरेंद्र नागिया, बलविंदर, कुलदीप मलिक, अनु, कोमल, नवदीप आर्य, जितेंद्र, स्वाति गोयल, राजेश रांझा, रश्मि और सुमंत ग्रोवर भी जुड़े।
संस्कृत की संवहन क्षमता अन्य भाषाओं से आगे
डॉर्टमाउथ यूनिवर्सिटी अमेरिका से डॉ. बलराम सिंह ने कहा कि भाषाएं और बोलियां तो संसार में हजारों की संख्या में हैं लेकिन मानव द्वारा वैज्ञानिक ढंग से परिमार्जित भाषा संस्कृत है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता इसके उच्चारण और व्याकरण में है। इस कारण इस भाषा की संवहन क्षमता अन्य भाषाओं से मीलों आगे हैं। वहीं सेंट स्टीफन महाविद्यालय दिल्ली से डॉ. पंकज कुमार मिश्र ने संस्कृत शिक्षण की विभिन्न कलाएं इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डाला।
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शिक्षक और शिक्षार्थी की निष्ठा ही ज्ञान
डीएवी पीजी कॉलेज देहरादून से डॉ. राम विनय सिंह ने कहा कि संस्कृत का समग्र बोध शिक्षण की विविध कलाओं के क्रमिक संधान से संभव है। शिक्षक और शिक्षार्थी की निष्ठा ही ज्ञान है जिसे छंदों के रुचिकर मार्ग पर चल कर ही सुबोध बनाया जा सकता है। उन्होंने भारतीय शिक्षण परंपरा के प्राचीन एवं नवीन रूपों की चर्चा की। नीतिशतक, हितोपदेश, पंचतंत्र और गीता जैसे महनीय ग्रंथों के श्लोक छंदों के माध्यम से सहज सुबोध रूप से शिक्षण की गायन विधियों पर चर्चा की।
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