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फितूर समीक्षा: दिमाग का दही कर देगी यह फिल्म

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निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर-अभिषेक कपूर
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निर्देशकः अभिषेक कपूर
सितारेः आदित्य रॉय कपूर, कैटरीना कैफ, तब्बू
रेटिंग *1/2

-हर फिल्म एक अनुभव होती है। फितूर इस लिहाज से खास है। इसके हर फ्रेम में बर्फ का ठंडा-सफेद रंग है। जो धीरे-धीरे आंखों के रास्ते दिमाग पर छा जाता है। वक्त बढ़ने के साथ इस सफेद से दिमाग उबर नहीं पाता और आप पाते हैं कि वह ठंडी-सफेदी में जमता जा रहा है।

जब फिल्म कुछ और आगे बढ़ती है तो दिमाग में जमी ठंडी-सफेदी दही का सा एहसास देती है और फितूर खत्म होते-होते आप पाते हैं कि दिमाग का दही हो गया! ठंडा-सफेद दही!! इस अनुभव को पाने के लिए यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
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फितूर की एक और खासियत। अगर आपने बहुत दिनों से कोई पहेली हल नहीं की और दिमाग में जंग लगता-सा मालूम पड़ रहा है तो इसे देखिए। यह दिमागी कसरत कराएगी।
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फितूर श्रीनगर में रहने वाले गरीब नूर की कहानी है

इसमें मौजूद किरदार कौन हैं, कहानी में उनकी वास्तविक भूमिका क्या है, अचानक आने वाले फ्लैश बैक में बदल जाने वाले किरदारों के चेहरे, एक आतंकी की दिलदारी, एक नौकर का रहस्य, रोमांस के पशमीने में कश्मीर और खीर के तलवारी-तार।

इन सबको आपस में जोड़ते हुए अगर आप अपना मनोरंजन कर सकें तो फितूर आपके लिए है। निर्देशक अभिषेक कपूर चार्ल्ड डिकंस के उपन्यास ग्रेट एक्सपेक्टेशंस के नाम का इस्तेमाल किए बिना भी फिल्म बना सकते थे क्योंकि यह फिल्म एक महान लेखक की कल्पना और विचारों का सिर्फ कंकाल है।

फितूर श्रीनगर में रहने वाले गरीब नूर (आदित्य रॉय कपूर) की कहानी है, जो बचपन से अमीर फिरदौस (कैटरीना कैफ) से प्यार करता है। फिरदौस की मां हजरत (तब्बू) कभी इसे हवा देती है और कभी बुझाने की कोशिश करती है।

कैरटीना के बाल इतना ध्यान खींचते हैं कि अभिनय नजर ही नहीं आता

बड़े होने पर नूर को एक अज्ञात व्यक्ति की मदद से दिल्ली जाकर अपने भीतर के कलाकार को संवारने का मौका मिलता है और देखते-देखते वह आर्ट की दुनिया में चमकदार नाम बन जाता है। उसे लगता है कि शायद अब फिरदौस उसे प्यार करे!

मगर वह मां की मर्जी से पाकिस्तान के एक रसूखदार नेता की पत्नी बनने को राजी है। क्यों...? यह सवाल जितना आकर्षक लगता है, फिल्म का क्लाइमैक्स उतना ही अनाकर्षक और संवेदनहीन है। मुंह पर पोत दी गई सफेदी जैसा।

निर्देशक ने फिल्म में सफेद के साथ लाल रंग का भी इस्तेमाल किया है। चिनार का लाल! सफेद में लाल खूब उठ के दिखता है। पर्दे से दिमाग में उतरने वाली सफेदी के बीच कैरटीना के लाल बाल इतना ध्यान खींचते हैं कि उनके अभिनय पर आपकी नजर ही नहीं ठहरती।

फिल्म में उनकी हिंदी का ब्रिटिश लहजा भी सफेद पर लाल जैसा है। जिस फ्रेम में निर्देशक उनके बाल लाल करना और होठों पर लाल लिपस्टिक लगवाना भूल गया, उसमें कैटरीना की उम्र सफेदी जैसी साफ उभर आती है।
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रेखा समझदार थीं जो छोड़ गई फिल्म

आदित्य रॉय कपूर सीधे आंखों में देखते हैं और उनका चेहरा सपाट रहता है। उनका खुले बदन का रंग सफेद और चिनार के लाल का मिक्स है। निर्देशक का आग्रह है कि इसे ही अभिनय माना जाए। कैटरीना के आगे वह बच्चे नजर आते हैं।

तब्बू की भूमिका देख कर लगता है कि रेखा बहुत समझदार हैं जो फिल्म को बीच में ही जन्नत की हकीकत जान कर इसे अलविदा कह गईं। महानता का एक लक्षण यह होता है कि वह एक आम आदमी को बार में समझ नहीं आती।

इस लिहाज से फितूर में काफी रिपीट वेल्यू है। खैर, इस पूरे श्वेत-लाल प्रकरण में यह ध्यान रखें की अगर आपकी जेब में रखा पैसा सफेद है तो एक बार जरूर सोच लें कि क्या इससे कोई और आवश्यक काम हो सकता है। वर्ना हॉल के अंदर एसी में भी आपके कान लाल-गर्म हो उठेंगे।
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