वेलेंटाइन दस्तक देने लगा है। टिकट खिड़की पर उसकी पहली आहट है, सनम तेरी कसम। यह प्यार की एक त्रासद कहानी है। फिल्म अपनी बुनावट के स्तर पर बहुत नई नहीं है लेकिन इसे हिंदी फिल्मों में कदम रख रहे दो चेहरों ने अपने काम से आकर्षक बनाया है।
जहां तक निर्देशकों का मामला है तो उन्होंने फिल्म को भावुकता के पैमाने पर कसने में काफी हद तक कामयाबी पाई है। आखिरी के पंद्रह मिनट में जरूर फिल्म उनके हाथ से फिसली है लेकिन उससे पहले इसमें प्रेम कहानियों के कामयाब मसालों का इस्तेमाल किया गया है।
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सनम तेरी कसम की ताजगी हर्षवर्द्धन राणे और मावरा हुसैन हैं। पाकिस्तान से आई मावरा जहां खूबसूरत और मासूम लगी हैं, वहीं ग्वालियर में जन्मे और पले-बढ़े हर्षवर्द्धन एक नाराज मगर भावुक युवक के रूप में पहचान छोड़ते हैं।
मासूम हैं हीरो-हीरोइन कहानी
दोनों कलाकार 2016 में बॉलीवुड में कदम रखने वाले ऐक्टरों की सूची में उल्लेखनीय जगह दर्ज कराते हैं। सरस्वती उर्फ सरू के रूप में मावरा अपने सख्त पिता (मनीष चौधरी) का हर आदेश मानने वाली बेटी हैं। ऐनक वाली इस पढ़ाकू लड़की को विवाह के लिए लड़के देखने आते हैं और हर बार इंकार कर जाते हैं।
इस वजह से सरू की छोटी बहन की शादी नहीं हो पा रही जबकि वह बॉयफ्रेंड के साथ सात फेरे लेने को आतुर है! उधर, इंदर (हर्षवर्द्धन) का एक अतीत है। वह आठ साल जेल में हत्या की सजा काट कर लौटा है। इंदर और सरू की प्रेम कहानी अनेक मोड़ों से गुजरती हुई आगे बढ़ती है।
लंबे समय बाद ऐसी युवा प्रेम कहानी आप देखते हैं जिसमें सादगी है। सहजता है। अनावश्यक उत्तेजना पैदा करने वाले चुंबन, बिकनी, बिस्तर, फूहड़ चुटकुले, गंदी बातें नहीं है।
पुरानी धारणा है कि अगर आप दर्शक को रुलाने में कामयाब हो जाएं तो सफलता दूर नहीं। रोने से जिनका दिल हल्का होता है उनके लिए इस फिल्म में आंसू बहाने की काफी गुंजायश है।
यहां लड़की बहुत रोती है। भले ही वह आधुनिक और अपने पैरों पर खड़ी है। फिल्म के चुनिंदा दृश्यों में दिखने वाला पुलिस इंस्पेक्टर (मुरली शर्मा) भी भावुक है। केवल लड़की का पिता सख्त है, जो जीते-जी बेटी का श्राद्ध कर देता है क्योंकि उसके संस्कारों/मूल्यों/भावनाओं को आहत करती हुई सरू उसकी गैर-मौजूदगी में एक सुबह इंदर के घर के अंदर पाई गई! पिता कतई जानने की कोशश नहीं करता कि वहां वह क्या कर रही थी?
फिल्म के संगीत से हिमेश रेशमिया का नाम जुड़ा है, मगर चमक गायब है। अच्छे गाने प्रेम कहानियों में प्लस पॉइंट होते हैं, जिनका यहां अभाव है। फिल्म 155 मिनट की है और यह लंबाई कहीं-कहीं एहसास दिलाती है कि कुछ-कुछ ओवर हो रहा है। इसके बावजूद यहां निःसंदेह प्रेम के कुछ भावुक पलों के बीच पारिवारिक ड्रामा भी है, जिसे परिवार के साथ भी देखा जा सकता है।