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दो चीफ आर्किटेक्ट प्लानर और एक एजीएम समेत सात पर हो सकती है कार्रवाई

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नोएडा। सुपरटेक के एमराल्ड कोर्ट प्रोजेक्ट मामले में नोएडा प्राधिकरण के सात अधिकारी जांच के घेरे में आ गए हैं। इनमें दो चीफ आर्किटेक्ट प्लानर (सीएपी), एक असिस्टेंट जनरल मैनेजर (एजीएम) समेत सात अधिकारी शामिल हैं। अब जल्द ही एसआईटी या नोएडा प्राधिकरण की जांच के बाद इन पर कार्रवाई हो सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने जिन बिंदुओं पर सवाल उठाए हैं। उन सभी में मंजूरी देने में इन्हीं सात अधिकारियों की भूमिका सामने आ रही है। इनकी तैनाती के दौरान ही सुपरटेक को सहूलियत मिली। जिन लोगों के नाम पहले चरण की जांच में शामिल किए गए हैं, उनमें नियोजन विभाग में तैनात रहे दो चीफ आर्किटेक्ट प्लानर, एक मैनेजर, एक प्लानिंग असिस्टेंट, इंजीनियरिंग विभाग के एक प्लानिंग असिस्टेंट के अलावा ग्रुप हाउसिंग का एक असिस्टेंट जनरल मैनेजर शामिल है।
इन तीन बिंदुओं पर की गई जांच
पहला : प्राधिकरण की ओर से एमराल्ड कोर्ट के बिल्डिंग ब्लॉक्स को लेकर जांच की गई। इसमें पाया गया कि पहले 5-5 टावर के तीन बिल्डिंग ब्लॉक्स के लिए मंजूरी मिली थी। इसके बाद दो टावर के लिए अलग से मंजूरी ली गई। यहां टावर-16 और 17 बाद में बनाए गए। इससे पहले टावर-1 और टावर 17 को लेकर विवाद था। पहले बताया गया था कि टावर-16 और 17 एक ब्लॉक होंगे और दूसरे टावरों से बिल्कुल अलग होंगे। यहां तक कहा गया था कि इनके बीच एक दीवार भी होगी। इन सभी बिंदुओं पर प्राधिकरण ने जांच कर जवाबदेह अधिकारी का नाम चिह्नित किया है।
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दूसरा : 2012 में दो टावरों के बीच की ऊंचाई और इनके बीच की दूरी को लेकर भी सवाल उठाया गया था। जब शुरू में 10 और 14 मंजिला इमारत बनाने के लिए मंजूरी ली गई थी तो उस समय इमारतों के बीच की दूरी और बाद में 40 मंजिला इमारत खड़ी होने के बाद इमारतों के बीच की दूरी को लेकर सवाल उठे। यहां कम से कम 12 मीटर की दूरी होने की बात कही गई थी, जबकि बिल्डर की ओर से 9 मीटर की दूरी को मानक के अनुरूप बताया गया। आरडब्ल्यूए की ओर से तर्क दिया गया था कि इस मामले में जैसे जैसे इमारत की ऊंचाई बढ़ती जाती है। वैसे-वैसे दो इमारतों के बीच की दूरी भी बढ़नी चाहिए।
तीसरा : उस दौरान एमराल्ड कोर्ट आरडब्ल्यूए की ओर से प्राधिकरण में एक आरटीआई लगाई गई। इसमें एमराल्ड कोर्ट की ड्राइंग मांगी गई थी। इसके अलावा कुछ अन्य जानकारियां भी मांगी गई थीं, लेकिन उस दौरान प्राधिकरण के कुछ अधिकारियों की ओर से फाइल पर की गई नोटिंग और कोर्ट में मामले का हवाला देते हुए आरटीआई का जवाब देने से टालमटोल किया गया। इसके बाद जवाब नहीं मिल पाया।
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