हाथियों को कॉर्बेट पार्क में लाया गया था, जिनमें कंचंभा नाम की हथिनी गर्भवती थी। गर्भवती हथिनी ने दो अगस्त 2018 में कालागढ़ हाथी कैंप में नर हाथी को जन्म दिया था। कॉर्बेट प्रशासन ने पहले उसका नाम शंभू रखा था, लेकिन बाद में विवादों से बचने के लिए उसका नाम सावन रखा गया।
2019 में कॉर्बेट प्रशासन ने उसके पहले जन् दिन के अवसर पर 140 किलो का केक तैयार किया था और धूमधाम से जन्मदिन मनाया था। इस साल उसके लिए 80 किलो का केक बनाया और पार्क प्रशासन ने उसका जन्मदिन धूमधाम से मनाया। सावन को कॉर्बेट का ब्रांड एंबेसडर बनाने की कवायद कॉर्बेट प्रशासन द्वारा चल रही है।
व्यवहार में आया बदलाव
वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण हाथियों के व्यवहार में परिवर्तन देखने को मिल रहा। समय से बारिश न होने के कारण इनका पलायन भी प्रभावित हुआ है। घटते और कटते जंगल, इंसानी दखल और प्रिय भोजन रोहनी और बांस के पेड़ों का कम होना भी चुनौती है।
पहले गर्मी शुरू होते ही हाथियों का पलायन फतेहपुर-हाथी गलियारा, सीतावनी गलियारे से ढिकाला चौड़ की ओर होता था। पिछले कुछ सालों से चौड़ों का जलना बंद हो गया है, जिसकी वजह से हाथियों का पलायन न के बराबर रह गया है।
कॉर्बेट नेशनल पार्क में लगातार बाघों की बढ़ती संख्या से तेंदुओं के लिए चुनौती बनती जा रही है। बाघ अपने इलाके में किसी और का रहना पसंद नहीं करते। ऐसे में बाघों द्वारा तेदुंओं को कॉर्बेट पार्क से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
कॉर्बेट नेशनल पार्क में 234 बाघ हैं तो वहीं उसके लैंडस्केप में 35 बाघ मौजूद हैं जबकि कॉर्बेट पार्क में तेंदुओं की संख्या नहीं है। बाघ और तेंदुए दोनों के स्वभाव में काफी अंतर होता है। सीटीआर निदेशक राहुल ने बताया कि तेंदुआ आबादी के पास रहना पसंद करते हैं। ऐसे में बाघों की संख्या बढ़ने के कारण तेंदुआ उस एरिया को छोड़ देता है। बावजूद इसके ढिकाला आदि क्षेत्रों में तेंदुए दिखाई देते रहे हैं
कॉर्बेट में हाथियों का कुनबा बढ़ रहा है। हाथियों की संख्या में बढ़ोत्तरी से साफ है कि कॉर्बेट में हाथियों को उनका मनचाहा भोजन मिल रहा है। हाथियों के लिए कॉर्बेट की ओर से बेहतर प्रबंधन किया जा रहा है।
-राहुल, सीटीआर निदेशक