वर्ष 1902 में लैंसडौन से पंडित गिरिजादत्त नैथानी ने प्रेस की स्थापना की और गढ़वाल का पहला समाचार पत्र गढ़वाल समाचार पत्र निकाला। उनके बाद हिंदी के प्रथम डी. लिट डा. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. भक्त दर्शन ने हिंदी साहित्य में खूब नाम कमाया। भजन सिंह, डा. शिव प्रसाद डबराल, भैरवदत्त धूलिया, आदित्यराम दुतपुड़ी, ललिता प्रसाद नैथानी और पीतांबर दत्त देवरानी ने हिंदी की धारा को प्रवाहित करने में अहम भूमिका निभाई। वर्तमान समय में डा. नंदकिशोर ढौंडियाल अरुण, वेद प्रकाश माहेश्वरी, नागेंद्र ध्यानी, गणेश खुगशाल गणि, डा. जगदंबा कोटनाला, ललन कुमार बुड़ाकोटी समेत कई कवि और साहित्यकार हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में कार्य कर रहे हैं। कोटद्वार की साहित्यिक संस्था साहित्यांचल पिछले कई सालों से हिंदी साहित्य पर केंद्रित वार्षिक पत्रिका का प्रकाशन कर रही हैं।
नई टिहरी ने दिए मंगलेश डबराल और वीरेंद्र डंगवाल जैसे साहित्यकार
टिहरी के मंगलेश डबराल और डा. वीरेन डंगवाल साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी लेखक रहे हैं। दोनों राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य संपादक रहे। मंगलेश डबराल काफल पानी गांव में जन्मे। उनकी पहाड़ पर लालटेन, हम जो देखते हैं, लेखक की रोटी, एक बार आयोवा, आवाज भी एक जगह है जैसी प्रसिद्ध कविताएं हैं। डा. वीरेन डंगवाल का जन्म कीर्तिनगर में हुआ। इसी दुनिया में, दुष्चक्र में स्रष्टा, कवि ने कहा, स्याही ताल उनकी प्रमुख रचनाएं रही हैं। विद्यासागर नौटियाल का जन्म मालीदेवल गांव में हुआ। उलझे रिश्ते, सूरज सबका है, टिहरी की कहानियां, भीम अकेला, भैंस का कट्या, सोना, उत्तर बांया है, मोहन गाता जाएगा, टिहरी के बागी. गाए जा जैसी कई कहानियां हैं, जिन पर टेलीविजन सीरियल भी बने। मौजूदा समय में साहित्यकार सोमवारी लाल उनियाल, गजेंद्र नौटियाल, और सत्यानंद बडोनी भी हिंदी को मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं।
उत्तरकाशी : लीलाधार जगूड़ी व महावीर रवांल्टा छाए
जनपद के साहित्यकारों में पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी व महावीर रवांल्टा प्रमुख हैं। जगूड़ी ने उत्तराखंड के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की पहली पत्रिका उत्तरांचल दर्शन का संपादन भी किया। शंखमुखी शिखरों पर (कविता संग्रह) नाटक जारी है। इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, अनुुभव के आकाश में चांद, महाकाव्य के बिना, खबर का मुंह विज्ञापन से ढंका है, पांच बेटे (नाटक), भय भी शक्ति देता है जैसी रचनाएं खासी चर्चित रही हैं। महावीर रवांल्टा का जन्म यमुना घाटी के सरनौल गांव में हुआ था। महावीर रवांल्टा चार दशकों से साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उनकी 38 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हें विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है। उत्तरकाशी में साहित्य के क्षेत्र में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन कार्य कर रहा है।
चमोली: हिंदी साहित्य सृजन में बीता शिवराज सिंह नि:संग का जीवन
चमोली जिले में हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने के लिए कई लोगों ने अद्वितीय कार्य किया है। इनमें सबसे प्रमुख और चर्चित रहे घिंघराण क्षेत्र के देवर खडोरा गांव के शिवराज सिंह नि:संग हैं। साहित्यकार स्वर्गीय शिवराज सिंह ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के लिए समर्पित किया था। उन्होंने करीब 20 किताबों का लेखन किया, जिसमें से कालीमठ काली तीर्थ, उत्तराखंड में चंडिका जात, पेशावर गोलीकांड का लौह पुरुष, बदरीनाथ धाम दर्पण, केदार हिमालय और पंच केदार आदि प्रमुख किताबें रहीं। सकंड गांव के स्वर्गीय चंद्र बल्लभ पुरोहित ने भी लंबे समय तक हिंदी काव्य लेखन किया। मौजूदा समय में साहित्यकार शशि देवली हिंदी साहित्य के लिए समर्पित हैं।
ऊधमसिंह नगर: हिंदी को बढ़ावा देने में कई साहित्यकार जुटे
जिले में हिंदी के कवि और कथाकार आज भी शिद्दत से हिंदी को बढ़ावा देने में जुटे हैं। इनमें मुख्य रूप से देशभर में कविताओं के लिए चर्चित बल्ली सिंह चीमा, पहले कहानी संग्रह मेंढक से चर्चा में आए रिटायर्ड बैंक अधिकारी गंभीर सिंह पालनी शामिल हैं। डिग्री कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ. शंभू दत्त पांडे शैलेय, कस्तूरी लाल तागरा, किरन अग्रवाल, सिद्धेश्वर सिंह सरीखे कवि और कथाकार शामिल है। इसके अलावा, रचनाओं के लिए चर्चा में रहने वाले युवा कवि डॉ. खेमकरण सोमन भी हैं। किसान और कवि बल्ली सिंह चीमा के दस कविता संग्रह छप चुके हैं। उनके लिखे गीत तमाम आंदोलनों में गाए जाते हैं।
पिथौरागढ़ : अनवरत साहित्य साधना में जुटे साहित्यकार
जिले के साहित्यकार अनवरत साहित्य साधना में जुटे हैं। उनकी इसी साधना की बदौलत हिंदी का भी विस्तार हो रहा है। साहित्यकार और शिक्षक डॉ. पीतांबर अवस्थी ने हिंदी और संस्कृत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2003 में पिथौरागढ़ के बजेटी में पुस्तकालय खोला। पुस्तकालय लोगों में हिंदी और साहित्य के प्रति लगाव बढ़ाने में सफल साबित हो रहा है। साहित्यकार और शिक्षक महेश चंद्र पुनेठा पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए गांव-गांव पुस्तकालय खोलने का अभियान चला रहे हैं। युवा लेखक साहित्यकार ललित शौर्य बच्चों में हिंदी पढ़ने की आदत बढ़ाने के लिए तीन हजार से अधिक बच्चों तक निशुल्क बाल साहित्य की किताबें बंटवा चुके हैं।
चंपावत : हिंदी साहित्य जगत को दी आंचलिक पहचान
जिले के खेतीखान गोशनी निवासी प्रसिद्ध साहित्यकार हिमांशु जोशी को सामाजिक ऊंच-नीच और जाति व्यवस्था पर प्रहार करने वाली उनकी साहित्यिक रचना कगार की आग (उपन्यास) ने जहां विश्व प्रसिद्धि दिलाई वहीं उन्होंने हिंदी साहित्य जगत को आंचलिक पहचान प्रदान करने में कामयाबी हासिल की थी। वर्ष 2018 में नई दिल्ली में रहते हुए उनका देहावसान हो गया था पर उनकी पुस्तकें हिंदी को बढ़ावा दे रहीं हैं। वर्तमान में डॉ.विष्णु दत्त शास्त्री सरल, कैलाश चंद्र लोहनी, डॉ.कीर्तिबल्लभ सक्टा, सुभाष जोशी, डॉ.बीसी जोशी, कुलदीप उप्रेती, डॉ.टीआर जोशी सहित अन्य साहित्यकार हिंदी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।
अल्मोड़ा : जिले के साहित्यकारों का देश में है बड़ा नाम
जिले के साहित्यकारों ने साहित्य के क्षेत्र में पूरे देश में अमिट छाप छोड़ी है। इला चंद्र जोशी की शताब्दी 2003 में मनाई गई। हिंदी मनोवैज्ञानिक उपन्यास की शुरुआत करने वाले साहित्यकार इला चंद्र जोशी रहे। मनोहर श्याम जोशी उत्तर आधुनिक अवधारणा वाले कथाकार रहे। टीवी धारावाहिक ‘बुनियाद’, ‘हम लोग’ आदि की पटकथाएं उन्होंने लिखी। शैलेश मटियानी ने आंचलिक कथा साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया। पंकज बिष्ट, सुमन बिष्ट, संजय खाती, शेखर जोशी, बलवंत मनराल, पानू खोलिया, शेर सिंह बिष्ट (अनपढ़), गिरीश तिवारी गिर्दा, चारू चंद्र पांडे, प्रो. शेर सिंह बिष्ट, क्षितिज शर्मा, सल्ट क्षेत्र के के हीरा सिंह राणा, मथुरा दत्त मठपाल समेत कई बड़े नाम हैं जो हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने में जुटे हैं।
बागेश्वर : सुमित्रानंदन पंत ने हिंदी को दो नई उड़ान
प्रकृति की गोद में बसे कौसानी की धरती ने सुमित्रानंदन पंत के रूप में देश को छायावादी, प्रगतिवादी, अध्यात्मवादी कवि दिया। पद्मभूषण पंत का संपूर्ण जीवन रचना में रत रहा। अविवाहित पंत जी की रचनाओं में नारी और प्रकृति के प्रति सौंदर्यपरक भावना की झलक मिलती है। पंत जी की स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, वाणी, पल्लव, युगांत, उच्छ्वास, ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, कला और बूढ़ा चांद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम प्रमुख रचनाएं रहीं हैं। सुमित्रानंदन पंत की परिपाटी को जिले के साहित्यकारों में केशवानंद जोशी, डॉ. राजीव जोशी, डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी, गोपाल दत्त भट्ट, मोहन जोशी जैसे लोग बढ़ा रहे हैं।
नैनीताल : ‘बटरोही’ गिर्दा की परंपरा को बढ़ा रहे आगे
नैनीताल जिले में वर्तमान साहित्यकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, डॉ. प्रयाग पांडे, दिनेश कर्नाटक, स्वाति मेलकानी, मोहन सिंह रावत (सदस्य, उत्तराखंड भाषा संस्थान), दिनेश उपाध्याय, संतोष कुमार तिवारी आदि सभी प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। ये सभी हिंदी को अपनी कलम की स्याही से सींच रहे हैं। प्रमुख हिंदी साहित्यकार गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, प्रेम सिंह नेगी, शैलेश मटियानी की परंपरा को उक्त सभी साहित्यकार आगे बढ़ा रहे हैं। हल्द्वानी क्षेत्र से आधारशिला के संपादक स्व. दिवाकर भट्ट ने हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान दिलाने के लिए कई दशक तक कार्य किया। उत्तराखंड भाषा संस्थान के सचिव मोहन सिंह रावत ने बताया कि कुमाऊं विवि की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ अपने स्थापना वर्ष 2005 से हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयास में अनवरत जुटी है।