दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान से मैं सुशील दोषी बोल रहा हूं। साफ आसमान, खुली हुई धूप, रह रह तक चलती हवा। भारत ने टॉस जीता है और बल्लेबाजी का फैसला किया है। बॉब विलिस की पहली गेंद गावस्कर को। आफ स्टंप से थोड़ा बाहर। गावस्कर ने गेंद को अच्छी तरह समझा, बैकफुट पर गए, शॉट के लिए जगह बनाई और कवर की तरफ खेला। पहला रन भारत के खाते में। पहला रन गावस्कर को। क्रिकेट में ये शब्द, ये अहसास श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते थे। यह क्रिकेट की कमेंटरी थी, जिससे लाखों करोड़ों लोग दशकों तक अभिभूत रहे। यह क्रिकेट कमेंट्री दर्शकों को रोमांचित तो करती ही थी , जिस तरह रेडियो के नाटकों में श्रोता परिकल्पना करता है, वैसे ही क्रिकेट के मैदान की पूरी गतिविधियां सुनने वालों की कल्पना में आती थी। यह कमेंटेटर और श्रोताओं के बीच एक अद्भुत तानाबाना था जिसमें वह जो आंखो देखा हाल सुनाता था, उससे श्रोताओं को यही लगता था कि वह कोई मैच देख रहे हैं। सुशील दोषी जैसे कमेंटटर ने इस कमेंट्री के लिए नए शब्द दिए, मुहावरे तलाशे। चौका छक्का या बोल्ड होने पर, या शतक बनने पर क्रिकेट पेवेलियन में दर्शकों के शोर, नारे, उत्साह की जो लहरें दौड़ती थी, वह लहर रेडियो के जरिए दूर दराज के कस्बों तक पहुंच जाती थी। चाय की दुकन हो, या पान की दुकान या लोगों के घर हर जगह कमेंट्री की आवाज सुनाई देती थी। और अगर क्रिकेट में मायूसी का क्षण है तो वह भी रेडियो से चारों दिशाओं में पसरता था। भारत क्रिकेट में गहरे संकट में हो तो रेडियो में कमेंट्री हाल बताती थी। इस कमेंट्री का प्रताप है कि सुशील दोषी स्पिनर इरापल्ली प्रसन्ना से कम स्टार नहीं थे। उनकी शोहरत भी वही रही जो उस जमाने के किसी जानेमाने क्रिकेटर की रही है।
बहुत पुराना किस्सा सुनाया था सुशील दोषी ने। ऑस्ट्रेलिया की टीम मुंबई में टेस्ट मैच खेल रही थी। सुशील दोषी ने किसी तरह अपने पिताजी को इस बात के लिए तैयार कर लिया था कि वे उन्हें मैच दिखाने के लिए ले जाएं। मुंबई तो पहुंचे लेकिन स्टेडियम के अंदर जाना संभव नहीं हो रहा था। बाहर भी लोगों का जमघट था । लेकिन सुशील को तो खिलाड़ियों को अपने सामने खेलते हुए देखना था। उनके पिताजी ने काफी कोशिश की लेकिन टिकट की बात नहीं बनी। गेट पर एक पुलिस वाला थोड़ा मेहरबान हुआ। गेट पर पुलिस वाले ने कहा कि दोनों में किसी एक व्यक्ति को तो जाने दे सकता हूं, दोनों को नहीं। फिर सुशील दोषी को ही अंदर जाना था। पिता ने बेटे के लिए तीन दिन तक रोज पांच छह घंटे स्टेडियम के बाहर गुजारे। स्टेडियम में ही जब बॉबी तल्यार खान और विजय मर्चेंट को कमेंट्री करते हुए देखा तो ठान ली थी कि अब कुछ नहीं कमेंटेटर ही बनना था।
सुशील दोषी की कमेंट्री केवल खेल का वर्णन नहीं करती। यह कमेंट्री उस पूरे माहौल का शब्द चित्र खींचती हैं। केवल सुशील दोषी ही नहीं, उन दिनों की क्रिकेट की कमेंट्री सुनाने वाले आंखो देखा हाल का बहुत दिलकश अंदाज में वर्णन करते थे। मनीष देव, मुरली मनोहर मंजुल, सुरैश सरैया, अनंत सितलवाड़, डॉ नरोत्तम पुरी इन सबसे क्रिकेट का हाल सुनना दिलचस्प था। एक बार राष्ट्रपति महोदय फिरोजशाह शाह कोटला मैदान में मैच देखने आए, सुनील गावस्कर ने तीन चौके लगाए और तीनों ही बार गेंद उस दिशा में गई, जहां देश के प्रथम व्यक्ति बैठे थे। रेडियो पर कमेंट्री आ रही थी गावस्कर का फिर शानदार स्ट्रेट ड्राइव चार रन के लिए। एक तरह से भारत के राष्ट्रपति को उनकी तरफ से यह अभिवादन। सुनने में रोमांचक। जो स्टेडियम में न भी रहा हो, उसे भी उतना ही रोमांच हुआ होगा। इसी तरह जोहांसबर्ग में जब नेल्सन मंडेला क्रिकेट देखने आए। एक बेहतरीन स्ट्रोक से गेंद उस दिशा की ओर बिजली की गति से आई। बल्लेबाज को चार रन मिले और कमेंट्र्टर सुशील दोषी यही बता रहे थे कि मंडेला के स्वागत का इससे बेहतर तरीका और क्या होता। सुशील दोषी ने क्रिकेट की खास शैली विकसित की। उनकी क्रिकेट कमेंट्री ही थी कि प्रख्यात लेखक धर्मवीर भारतीजी ने एक बार कहा था कि सुशील दोषी ने अपनी कमेंट्री से हिंदी की बहुत सेवा की। इस कमेंट्री को मुंबई में भी सुना गया, असम में भी पणजी, उड़ीसा, बिहार, उप्र, हिमाचल, कहां-कहां नहीं पहुंची यह कमेंट्री। सुंदर वाक्य, प्रवाह, उतार चढ़ाव, सहजता, स्पष्टता, सुंदर उच्चारण, और क्रिकेट का ज्ञान, स्मरण, घटनाओं को जोड़ने का कौशल ऐसे तमाम गुणों के साथ सुशील दोषी जब भी कमेंट्री करने के लिए कमेंटेटर बॉक्स में बैठे कमेंट्री गूंजने लगी।
सुशील दोषी की पढ़ाई इंजीनियरिंग की रही है। एक समय वो भी था, जब इंदौर आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर उनकी बात पर हंस पड़े थे, कमेंट्री वो भी हिंदी में। बहुत मुश्किल है हिंदी में क्रिकेट कमेंट्री करना। आखिर शॉर्टपिच गेंद को क्या कहोगे, बैक फुट ड्राइव को क्या कहोगे, स्केवर लेग, ओवर द विकेट को क्या कहोगे। थर्ड मैन को क्या कहोगे तीसरा आदमी। जवाब भी बहुत आसान था, इन्हें कुछ और कहने की जरूरत ही नहीं, ये शब्द बने रहेंगे पर कहा हिंदी में जाएगा। क्या यह नहीं कह सकते कि शार्ट पिच गेंद आफ स्टंप के बाहर, बल्लेबाज बैकफुट पर गए , खूबसूरती के साथ खेला चार रन के लिए। जो क्रिकेट खेला था उससे अच्छी मदद मिली। तब पता रहता था कि किस गेंद को बल्लेबाज कैसे खेल सकता है। 1968 में रणजी ट्राफी में सुशील दोषी ने पहली बार क्रिकेट कमेंट्री की थी। उसके बाद टेस्ट मैच, विश्व कप, एकदिवसीय मैच, लगभग हर बड़े टूर्नामेंट्स में सुशील दोषी ने कमेंट्री की। क्रिकेट की दुनिया में पिछले चार दशकों में कई रोमांचक क्षणों के साक्षी रहे हैं सुशीष दोषी। क्रिकेट को केवल गावस्कर कपिल और सचिन ने ही आकर्षक नहीं बनाया उसे हिंदी के इन कमेंटेटरों ने भी आकर्षक बनाया है।
रेडियो पर तो अच्छे कमेंटेटर रहे लेकिन टीवी पर कमेंट्री के लिए क्रिकटेरों ने माइक लपक लिए। अगर टीवी पर क्रिकेट को सुने देखें तो सुनील गावस्कर, वसीम अकरम बहुत अच्छी कमेंट्री करते रहे हैं। एक दम सधी हुई और संतुलित । लेकिन कपिल देव, मोहम्मद कैफ, आकाश चोपड़ा, वीरेंद्र सहवाग, नवजोत सिद्धू ने क्रिकेटर होने से कमेंट्री बॉक्स में तो चले गए लेकिन कभी भी अच्छी कमेंट्री नहीं कर पाए। कपिल देव जितने बड़े क्रिकेटर रहे हैं, कमेंट्री में उतने ही बार बोल्ड हो जाते हैं। क्रिकेट की दुनिया में ज्यॉफ बॉयकाट, टोनी कोजियर, टोनी ग्रेग जैसे खिलाड़ी रहे हैं, जिन्होंने शानदार कमेंट्री की। इसी तरह सुनील गावस्कर अंग्रेजी हिंदी में बढ़िया कमेंट्री करते रहे। कई क्रिकेटरों के खेल से अलग होने के बाद कमेंट्रेटर बन जाने का सबसे बड़ा नुकसान यही हुआ कि टीवी कमेंट्री सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल, रवि चतुर्वेदी जैसे कमेंट्रेटरों को नहीं सुन पाई। ऐसे क्रिकेटरों को झेलना पड़ा जो खेल तो सकते थे लेकिन खेल को सुना नहीं सकते थे। क्रिकेट कमेंट्री का लुत्फ लेने वालों को यह बात जरूर अच्छी लगेगी कि सुशील दोषी को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। यह हिंदी क्रिकेट कमेंट्री का सम्मान है।