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कोविड-19 टीके के प्रति भरोसा, भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान

राम्या पिनामनेनी एवं श्रावंती एम शेषशायी Published by: राम्या पिनामनेनी Updated Tue, 16 Feb 2021 12:01 PM IST
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कोरोना वैक्सीन लगातीं स्वास्थ्यकर्मी - फोटो : अमर उजाला

विगत 16 जनवरी को भारत ने कोविड-19 के खिलाफ लगभग 30 करोड़ अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं के टीकाकरण का लक्ष्य रखकर दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू किया था। यह अभियान देश में तैयार कोवाक्सिन और कोविशील्ड टीकों के जरिये चलाया गया और जिसे महामारी द्वारा ग्यारह महीनों की घेराबंदी के संभावित अंत की शुरुआत बताया जा रहा है। पिछले एक साल में महामारी ने मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और वैश्विक व राष्ट्रीय स्तर पर तैयारियों के लिए चुनौती पेश की है। भारत जैसे निम्न से मध्य आय वाले देशों ने यह मानते हुए, कि उनके स्वास्थ्य तंत्र पर बढ़ता दबाव सहने की क्षमता कम है, कोविड-19 के खिलाफ व्यापक निगरानी तथा जोखिम से निपटने के लिए लोगों को जागरूक करने का अभियान शुरू करने पर ध्यान केंद्रित किया। 



इस तरह की रणनीतियां न तो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए नई हैं और न ही भारत के लिए। दशकों से क्षेत्रीय महामारियों से निपटने के प्रशिक्षण के साथ देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना में व्यापक सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन के उद्देश्य से संचार रणनीतियों का उपयोग शामिल है। उदाहरण के लिए, 2018 के पोषण अभियान का मुख्य घटक जनांदोलन है। अब कोविड-19 संचार में इसे लागू किया जा रहा है। इसमें मौजूदा प्लेटफार्मों के माध्यम से संदेशों का सामुदायिक प्रसार और सभी हितधारकों को एकजुट करने वाले एकीकृत विविध मीडिया आख्यान शामिल हैं। गौरतलब है कि 20 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने, जो पहले से ही ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में शामिल हैं, कोविड -19 पर लोगों को शिक्षित करने के लिए मातृ और बाल स्वास्थ्य में अपनी भूमिकाओं का विस्तार किया।


विगत अप्रैल में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने अंतर-मंत्रालयी सहयोग और राष्ट्रीय व राज्य-स्तरीय प्रतिक्रियाओं के तालमेल के साथ महामारी की भीषण चुनौती से निपटने को एक नियंत्रण योजना जारी की। विगत मार्च-अप्रैल में दूरदर्शन पर हिंदी और अंग्रेजी में कुल 36 वीडियो प्रसारित किए गए, जबकि महामारी के व्यापक रूप लेने के बरक्स अधिकाधिक क्षेत्रीय सामग्री विकसित और प्रचारित करना जारी रहा। कोविड-19 वैक्सीन के प्रति लोगों में भरोसा जगाने के लिए सार्वजनिक 

स्वास्थ्य विभाग, स्वास्थ्य पत्रकारों, वैज्ञानिक विशेषज्ञों और दवा उद्योग के दिग्गजों ने संभावित वैक्सीनों के विवरण पेश किए तथा टीके के प्रकार, उनके तंत्र, नैदानिक परीक्षण, सुरक्षा के सभी महत्वपूर्ण पैमाने और प्रभावशीलता से जुड़ी जानकारियां प्रदान कीं। 


राष्ट्रीय कोविड-19 वैक्सीन संचार रणनीति ने नए टीकों पर पारदर्शी रूप से सूचना प्रसारित करने के लिए वैक्सीन के प्रति संकोच को खत्म किया, उसके प्रति भरोसा जगाया और टीकाकरण अभियान के बारे में लोगों को सूचित किया। पहले से जुड़े हितधारकों ने अब समुदाय को प्रभावित करने वाले लोगों और नेताओं के साथ भागीदारी करने पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे कि टीके के बारे में सटीक जानकारी प्रसारित करने, टीके के लाभ पर साक्ष्य आधारित सोशल एवं पारंपरिक मीडिया सामग्री

तैयार करने, गलत सूचनाओं पर काबू पाने के लिए डिजिटल मीडिया की निगरानी करने तथा लोगों का भरोसा जीतने के लिए वैक्सीन-प्रतिरोधी समूहों की पहचान कर उनके साथ काम किया जा सके। 


सामूहिक टीकाकरण अभियानों के भारत के अनुभव को इसके सफल कार्यान्वयन द्वारा चिह्नित किया गया है, जो टीका के प्रति भरोसा जगाने के लिए बड़े पैमाने पर संचार और सामाजिक मीडिया रणनीतियों का उपयोग करता है। यह भरोसा नवंबर, 2020 
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के एक सर्वेक्षण में परिलक्षित हुआ, जिसमें 87 फीसदी भारतीयों ने उपलब्ध होने पर कोविड-19 का टीका लगवाने की इच्छा जताई। हालांकि हमें मुश्किल से जीते हुए इस भरोसे को बरकरार रखने के प्रति सावधान रहना चाहिए। तीन जनवरी, 2021 को एक अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत, जिसने वैक्सीन विशेषज्ञों और लोगों को हैरान कर दिया, भारत के सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) ने कोवाक्सिन को आपातकालीन परिस्थितियों में भारी सावधानी के साथ उपयोग की मंजूरी देने की घोषणा की, जिसका तब नैदानिक परीक्षण पूरा नहीं हुआ था। वैज्ञानिक समुदाय के अलावा विशेषज्ञों ने भी

कोवाक्सिन के तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण के आंकड़े के अभाव पर संदेह और चिंताएं व्यक्त कीं, जो टीका की प्रभावकारिता का प्रदर्शन करते हैं।


कोवाक्सिन को दी गई मंजूरी की भाषा भी भ्रामक थी, जिसमें उसे क्लिनिकल ट्रायल के तौर पर मंजूरी दी गई थी। इससे सार्वजनिक विमर्श में टीके के प्रति एक प्रकार का भ्रम पैदा हुआ। अतीत में भी भारत में टीके के प्रति अविश्वास एवं संकोच देखा गया है। हम कोविड-19 के खिलाफ अपने प्रयासों में एक महत्वपूर्ण बिंदु पर पहुंचे हैं, जिसमें टीके के प्रति सार्वजनिक भरोसा

अब भी पारदर्शिता, अखंडता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार द्वारा फिर से जीता जा सकता है। चूंकि अग्रिम पंक्ति के और उच्च जोखिम वाले लोगों को सार्वजनिक निगरानी के तहत दुनिया भर में और भारत में टीके लगने लगे हैं, इसलिए सरकारों, विशेषज्ञों और मीडिया को वैज्ञानिक शब्दजाल के बजाय सबसे अधिक प्रासंगिक और आसानी से समझी जाने वाली भाषा को प्राथमिकता देनी चाहिए।


उन्हें उन तथ्यों के हर कदम, जिन्हें हम जानते हैं या नहीं जानते हैं और हर उदाहरण को दोहराना चाहिए कि कैसे कोई व्यक्ति या संस्थान अच्छी तरह से खुद की रक्षा कर सकता है। तथ्यों को जांचने की सेवाओं का उदय आशाजनक है। जैसा कि भारत बताता है कि कोविड-19 महामारी के अंत का समाधान क्या है, हमें टीके और कोविड-19 सावधानियों पर विवेकवान बने रहना चाहिए, और इस अंतिम चरण में पीछे की ओर कदम नहीं बढ़ाना चाहिए। 


(-राम्या पिनामनेनी हार्वर्ड टी.एच में रिसर्च फेलो व चिकित्सक हैं तथा श्रावंती एम शेषशायी मैनेहेल्थ में रिसर्च एनालिस्ट हैं। लेखिकाद्वय हार्वर्ड टी.एच से जन स्वास्थ्य में ग्रेजुएट हैं।) 

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