वहीं गुरु के प्रति आस्था इस हद तक थी कि करीब 100 लोग श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी के आगे-आगे नंगे पांवों झाड़ू से रास्ते की सफाई करने में जुटे थे। नगर कीर्तन के दौरान जगह-जगह लंगर और ठंडे मीठे जल के स्टाल लगे हुए थे। बाबे के विवाह पर्व को लेकर सोमवार को बटाला के सभी गुरुद्वारों को सजाया गया था औैर गुरुबाणी का प्रवाह चल रहा था।
बटाला स्वागती गेट होर्डिंग से भरा पड़ा था। नगर कीर्तन में ट्रैक्टर-ट्रालियों पर बैठी महिलाओं के कीर्तन जत्थे गुरु की बाणी का गुणगान करने में मस्त थे। बाबे के विवाह को लेकर बटाला शहर खचाखच भरा हुआ था क्योंकि बटाला के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोग सोमवार सुबह करीब चार बजे ही बटाला पहुंच गए थे।
रविवार को बाद दोपहर गुरुद्वारा कंध साहिब में तिल रखने के लिए भी जगह नहीं थी क्योंकि हरेक श्रद्धालु युगों से स्थापित ऐतिहासिक कच्ची कंध के दर्शन करने के लिए उत्सुक था। सारा दिन बटाला में नगर कीर्तन के दौरान गहमा-गहमी रही। सड़कों के किनारे पर रागी, टाढ़ी, प्रचारक और कविशर गुरु नानक जी के जीवन और आदर्शों के बारे में लोगों को जानकारी दे रहे थे। नगर कीर्तन गुरुद्वारा डेहरा साहिब से शुरू होकर पूरे शहर से गुजरते हुए देर शाम को गुरुद्वारा डेहरा साहिब में ही समाप्त हो गया।