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ऊर्जा संकट: खतरे में पड़ रही हैं अर्थव्यवस्थाएं, जल्द समाधान की उम्मीद नहीं

Fri, 08 Oct 2021 03:40 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

पूर्वी एशिया में प्राकृतिक गैस की कीमत इसी अवधि में 85 फीसदी बढ़ी है। अमेरिका में अभी कीमतें काबू में हैं। इसकी वजह यह है कि अमेरिका प्राकृतिक गैस का एक प्रमुख निर्यातक है। फिर भी वहां इस समय गैस की जो कीमत है, वह 13 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है...
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energy crisis - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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दुनियाभर में ऊर्जा संकट हर रोज ज्यादा गंभीर होता जा रहा है। कोरोना महामारी के बाद बिजली और पेट्रोलियम की तेजी से बढ़ रही मांग और मौसम संबंधी भविष्यवाणियों के कारण दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में चिंता बढ़ रही है। कोयले और पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाते हुए ग्रीन एनर्जी की तरफ बढ़ने की अपनाई गई नीतियों ने मुश्किलों में और इजाफा कर दिया है। पश्चिमी देशों में सरकारें उपभोक्ताओं को इस संकट के असर से बचाने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। लेकिन कई देशों की सरकारों ने स्वीकार किया है कि वे ऊर्जा की महंगाई रोकने में सक्षम नहीं हैं।

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ऊर्जा संकट के लक्षण सबसे पहले चीन में नजर आए, जहां बिजली की कमी के कारण बड़े पैमाने पर लोड शेडिंग करनी पड़ी। उसके बाद ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के देशों में ये संकट दिखा। यूरोपियन यूनियन के ऊर्जा प्रमुख केड्री सिमसन ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘इस अहम मौके पर ऊर्जा की महंगाई एक अप्रत्याशित संकट के रूप में आया है। इसके बीच फौरी प्राथमिकता इसके सामाजिक असर को काबू में रखने और उपभोक्ताओं को संरक्षण देने की होनी चाहिए।’ यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमत में सितंबर की शुरुआत से लेकर अभी तक 130 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है।

पूर्वी एशिया में प्राकृतिक गैस की कीमत इसी अवधि में 85 फीसदी बढ़ी है। अमेरिका में अभी कीमतें काबू में हैं। इसकी वजह यह है कि अमेरिका प्राकृतिक गैस का एक प्रमुख निर्यातक है। फिर भी वहां इस समय गैस की जो कीमत है, वह 13 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में ऊर्जा विशेषज्ञ निकोस साफोस ने सीएनएन से कहा- ‘कीमतों में बढ़ोतरी इस फैले डर की वजह से भी हुई है कि सर्दियों में क्या होगा। इस चिंता ने मांग और आपूर्ति के आम संबंध को तोड़ दिया है।’ मौसम वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस साल सामान्य से ज्यादा सर्दी पड़ेगी।

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प्राकृतिक गैस की महंगाई के कारण कोयला और कच्चे तेल के दामों में भी उछाल आया है। प्राकृतिक गैस के विकल्प के रूप में इन दोनों ईंधनों का इस्तेमाल होता है। इस स्थिति ने सरकारों और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से में इस संकट के लिए चीन और रूस को दोषी ठहराया जा रहा है। उनकी रिपोर्टों में कहा गया है कि चीन में प्राकृतिक गैस की बढ़ी मांग का असर दुनिया भर पर पड़ा है। उधर इसी मौके पर रूस ने गैस का निर्यात घटा दिया। फ्रेंच बैंक सोसाइते जेनराल बैंक के ऊर्जा विश्लेषकों ने कहा है- ‘यूरोप में ऊर्जा के दाम में हुई मौजूदा बढ़ोतरी अभूतपूर्व है। अतीत में कभी बिजली की कीमत इतनी तेजी इस सीमा तक नहीं बढ़ी। जबकि अभी सर्दी नहीं आई है और मौसम सामान्य है।’

कंसल्टेंसी फर्म यूरेशिया ग्रुप में ऊर्जा, जलवायु और संसाधन टीम के निदेशक हेनिग ग्लोयस्टीन ने कहा है- ‘यूरोप में सर्दियों में सप्लाई में कमी की सबसे ज्यादा आशंका ब्रिटेन में है। अगर ऐसा हुआ तो सरकार को कारखानों को गैस उपभोग घटाने के लिए कहना पड़ेगा, जिससे उत्पादन घटेगा। ये चिंता भी है कि गैस की बढ़ रही कीमतों के कारण महामारी के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था में हो रहा सुधार खतरे में पड़ जाएगा।’

विशेषज्ञों के मुताबिक संकट का निकट भविष्य में कोई समाधान नहीं दिखता। धनी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने बीते मंगलवार को एक रिपोर्ट में बताया था कि अगस्त के बाद से विकसित देशों में ऊर्जा के दाम में औसतन 18 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। इसका असर उपभोक्ताओं के आम बजट पर पड़ा है।
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