प्राकृतिक गैस की महंगाई के कारण कोयला और कच्चे तेल के दामों में भी उछाल आया है। प्राकृतिक गैस के विकल्प के रूप में इन दोनों ईंधनों का इस्तेमाल होता है। इस स्थिति ने सरकारों और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से में इस संकट के लिए चीन और रूस को दोषी ठहराया जा रहा है। उनकी रिपोर्टों में कहा गया है कि चीन में प्राकृतिक गैस की बढ़ी मांग का असर दुनिया भर पर पड़ा है। उधर इसी मौके पर रूस ने गैस का निर्यात घटा दिया। फ्रेंच बैंक सोसाइते जेनराल बैंक के ऊर्जा विश्लेषकों ने कहा है- ‘यूरोप में ऊर्जा के दाम में हुई मौजूदा बढ़ोतरी अभूतपूर्व है। अतीत में कभी बिजली की कीमत इतनी तेजी इस सीमा तक नहीं बढ़ी। जबकि अभी सर्दी नहीं आई है और मौसम सामान्य है।’
कंसल्टेंसी फर्म यूरेशिया ग्रुप में ऊर्जा, जलवायु और संसाधन टीम के निदेशक हेनिग ग्लोयस्टीन ने कहा है- ‘यूरोप में सर्दियों में सप्लाई में कमी की सबसे ज्यादा आशंका ब्रिटेन में है। अगर ऐसा हुआ तो सरकार को कारखानों को गैस उपभोग घटाने के लिए कहना पड़ेगा, जिससे उत्पादन घटेगा। ये चिंता भी है कि गैस की बढ़ रही कीमतों के कारण महामारी के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था में हो रहा सुधार खतरे में पड़ जाएगा।’
विशेषज्ञों के मुताबिक संकट का निकट भविष्य में कोई समाधान नहीं दिखता। धनी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने बीते मंगलवार को एक रिपोर्ट में बताया था कि अगस्त के बाद से विकसित देशों में ऊर्जा के दाम में औसतन 18 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। इसका असर उपभोक्ताओं के आम बजट पर पड़ा है।