तालिबान भले जीत के जश्न में डूबा हो, पर उसे अलग-अलग गुटों को एकजुट कर अफगानिस्तान को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
जानकारों के मुताबिक, गहरे आर्थिक संकट में डूबे, मानवीय आपदा, सूखा, भुखमरी व विरोधी आतंकियाें का खतरा झेल रहे मुल्क में व्यवस्था स्थापित करना कड़ा इम्तिहान होगा। भले ही मुल्ला बरादर सरकार प्रमुख और मुल्ला अखुंदजादा सर्वोच्च नेता होंगे। लेकिन तालिबान के विभिन्न गुटों में सामंजस्य बिठाना आसान नहीं होगा।
शांति स्थापना पहाड़ पार करने जैसा
तालिबान के जानकार जाहिद हुसैन बताते हैं, 1990 के दौर में मुल्ला उमर के नेतृत्व में तालिबान एकजुट था। अब राजनीतिक और सैन्य संचालन जुदा है। जिन नेताओं ने दोहा में कई वर्षों तक वार्ताएं की हैं, उन्हें अब युवा कमांडरों के साथ काम करना होगा, जिन्होंने जंग लड़ी और उनकी सोच ज्यादा कट्टर है। ऐसे में वहां शांति लाना पहाड़ जैसी चुनौती होगा। एक पाकिस्तानी अधिकारी का कहना है, वहां गुरिल्ला जंग जारी रहेगी।
मतभेद हुए उजागर
तालिबान में ‘विजय’ जुलूस को लेकर भी मतभेद उजागर हुआ है। कुछ तालिबानी हक्कानी के बढ़ते राजनीतिक कद को लेकर भी चिंतित हैं। एक तालिबानी कमांडर ने नाम उजागर किए बिना बताया, अतीत में कंधार और जाबुल धड़ा निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा ताकतवर था पर काबुल पर कब्जे के बाद हक्कानी का प्रभाव बढ़ गया है।