उइगर मुसलमानों के दमन पर किताब लिखने वाले अमेरिका के जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सीन रॉबर्ट्स के मुताबिक अफगानिस्तान में लगभग तीन हजार उइगर मुसलमान हैं। उनमें से कई के पूर्वज तो 1949 में उस समय ही भाग कर यहां आ गए थे, जब कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन में अपनी सत्ता कायम की। बाकी कई परिवार 1970 के दशक में यहां आए। इनमें से कई उइगर मुसलमों के पास अब अफगान नागरिकता है। लेकिन कुछ परिवारों का दर्जा अभी भी चीनी शरणार्थी का है।
जानकारों का कहना है कि उइगर मुसलमानों के भयभीत होने की वजहें हैं। उनमें सबसे ज्यादा डर तब पैदा हुआ, जब पिछले जुलाई में तालिबान नेताओं के एक दल ने चीन की यात्रा की। वहां तालिबान और चीन दोनों ने एक दूसरे की तारीफ की। तालिबान ने चीन को अपना ‘अच्छा दोस्त’ बताया और कहा कि वह अपनी जमीन का कभी भी चीन के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देगा। पिछले हफ्ते तालिबान के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने चीन के टीवी चैनल सीजीटीएन को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘चीन हमारे पड़ोस में एक महत्वपूर्ण और मजबूत देश है। चीन के साथ हमारे सकारात्मक और अच्छे संबंध रहे हैं। अब हम इन संबंधों को और मजबूत करना चाहते हैं और आपसी विश्वास के स्तर में बढ़ोतरी करना चाहते हैं।’
इन बातों को उइगर मुसलमानों ने अपने खतरे का संकेत माना है। सीन रॉबर्ट्स ने कहा- ‘ऐसे बहुत सी वजहें हैं, जिनके कारण तालिबान चीन की शर्तों को मानते हुए उससे संबंध गहरा करने की कोशिश करेगा। खासकर उस समय उसके सामने ऐसा करने की मजबूरी भी है, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उसकी वित्तीय सहायता रोक दी है।’