ईयू के स्थापना घोषणापत्र में मूल अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने का प्रावधान है। हाल में इस प्रावधान को ईयू के बजट से जोड़ दिया गया। यानी अब बजट को खर्च करते वक्त इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि उस खर्च से ईयू का मूल उद्देश्य पूरा हो। लेकिन कई पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर इस प्रावधान को सख्ती से लागू किया गया, तो उससे ईयू के बिखराव की शुरुआत हो सकती है।
पोलैंड और हंगरी में हाल में ऐसे कानून बनाए गए हैं, जिनके तहत समलैंगिक और ट्रांसजेंडर समुदायों के लिए दिक्कतें खड़ी हुई हैं। ईयू की राय है कि ये कानून इन समुदायों के खिलाफ हैं। इस रूप में ये ईयू की आधारभूत आस्थाओं का उल्लंघन करते हैं। फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक यूरोपियन आयोग ने अभी तक नए प्रतिमानों को कोहेशन फंड से धन वितरण की प्रक्रिया से अलग रखा है। लेकिन आयोग की उपाध्यक्ष वेरा जोरोवा ने इस अखबार से कहा- ‘अब आयोग को नई शक्ति मिल रही है। वह इसे गंभीरता से ले रहा है। इसे कैसे लागू किया जाएगा, यह तय करने के लिए हम काम कर रहे हैं।’
जोरोवा ने कहा कि ईयू के चार्टर (घोषणापत्र) में यूरोप के नागरिकों और इसके सदस्य देशों के बुनियादी अधिकारों की व्याख्या की है। कोहेशन फंड से मिली रकम को कोई देश कैसे खर्च करेगा, यह वही तय करता है। लेकिन अब उसे यह बताना होगा कि क्या उसने ऐसा ईयू चार्टर के मुताबिक किया है।
पोलैंड के वित्त मंत्री ताडेउस्ज कोसिन्स्की ने चेतावनी दी है कि अगर ईयू ने पोलैंड की सहायता रोकी, तो पोलैंड में ईयू विरोधी भावनाएं भड़क उठेंगी। उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘जब राजनीति को आर्थिकी से मिलाया जाता है, तो उसका परिणाम कभी अच्छा नहीं होता।’ उधर हंगरी सरकार के प्रवक्ता ने कहा कि हंगरी को इस बारे में ईयू ने अभी तक नहीं बताया है कि उसकी सहायता रोकी जाएगी।