लेकिन जानकारों का कहना है कि अब अगर चीन कोयला से चलने वाले नए बिजली प्लांट लगाएगा, तो ये लक्ष्य हासिल होना नामुमकिन हो जाएगा। चीन जैसे ही ट्रेंड यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन और अमेरिका में देखने को मिल रहे हैं। आईईए ने कहा है कि अब जो हालत हैं, उसे देखते हुए यह लगता है कि दुनिया में 2050 को कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने का लक्ष्य 40 फीसदी ही हासिल हो पाएगा।
आईईए ने कहा है कि लक्ष्य और हकीकत के बीच फर्क बहुत चौड़ा हो चुका है। ये खाई तभी भर सकती है, जब दुनिया भर के देश ग्रीन एनर्जी को अपनाने के लिए चार ट्रिलियन डॉलर अगले एक दशक में खर्च करेँ। आईईए के कार्यकारी निदेशक फतीह बिरोल ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा कि कोविड-19 महामारी से उबर रहे बड़े देश ग्रीन एनर्जी की दिशा में जाने का एक बड़ा अवसर गंवा रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर साल 2100 तक धरती के तापमान में वृद्धि को 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकना है, तो कार्बन उत्सर्जन को इस सदी के मध्य तक शून्य करना होगा। अगर धरती के तापमान में अनियंत्रित बढ़ोतरी होती रही, तो जलवायु पर उसके खतरनाक परिणाम होंगे।
आईईए ने कहा है कि कार्बन शून्यता का लक्ष्य पाने के लिए चार ट्रिलिटन डॉलर की जिस रकम की जरूरत है, उसका 70 फीसदी हिस्सा उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों को देना होगा। फतीह बिरोल ने कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट ने यह साफ कर दिया है कि अभी दुनिया की बड़ी निर्भरता जीवाश्म ऊर्जा (पेट्रोलियम, गैस, कोयला) पर बनी हुई है। यानी इसका उपयोग कम कर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों की तरफ बढ़ने का काम बहुत कम हुआ है।