ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, और भारत ने दक्षिण चीन सागर में अपने लड़ाकू जहाज तैनात किए हैं। जानकारों का कहना है कि इसके जरिए इन देशों ने इस सागर पर चीन के दावों का जवाब दिया है। उन्होंने इसके जरिए मौजूदा ‘अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ की रक्षा करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। उधर अमेरिकी विश्लेषकों ने कहा है कि ये तैनाती चीन के प्रभाव को सीमित करने की अमेरिकी कोशिश के प्रति इन देशों के एकजुट समर्थन का प्रतीक है।
हालांकि क्षेत्र के कई विश्लेषकों ने कहा है कि इस अभियान को लेकर कई भ्रम कायम हैं। उन्होंने इस दावे पर सवाल उठाया है कि लड़ाकू जहाजों की ये तैनाती मुक्त नौवहन के प्रति चीन से पैदा हुई चुनौती का जवाब है। इन विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने कभी यह नहीं कहा कि वह सभी तरह के मुक्त नौवहन के खिलाफ है। चीन को आपत्ति कारोबारी नौवहन से नहीं, बल्कि इस इलाके में सैन्य तैनाती से रही है।
ऑस्ट्रेलिया, जापान और फिलीपींस शामिल नहीं हुए
विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिकी दबाव के बावजूद उसके कई सहयोगी देशों ने इस तैनाती में भाग लेने से इनकार कर दिया। इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, जापान और फिलीपींस शामिल हैं। इन देशों ने कहा है कि चीन ने व्यापारिक परिवहन रोकने या उनकी सुरक्षा के लिए कोई धमकी नहीं दी है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि अब तक सिर्फ ब्रिटेन ऐसा देश है, जो बिना शर्त अमेरिकी योजना का हिस्सा बना है। जहां तक जर्मनी का सवाल है, तो उसका रुख मिलाजुला है। उसने अपने जहाज की तैनाती के साथ ही चीन को यह आश्वासन दिया कि जर्मनी किसी भड़काऊ या टकराव वाली कार्रवाई में शामिल नहीं होगा। उसने ये भरोसा भी दिया कि उसका जहाज पारंपरिक समुद्री मार्गों में ही रहेगा। यह ताइवान जलडमरूमध्य में प्रवेश नहीं करेगा। विश्लेषकों के मुताबिक फ्रांस का रुख भी जर्मनी से मिलता जुलता है।
भारत ने नौसैनिक टास्क फोर्स को भेजा
भारत ने अपना नौसैनिक टास्क फोर्स को भेजा है, लेकिन साथ ही कहा है कि उसका मकसद वहां कामकाजी पहुंच को सुनिश्चित करना, शांति पूर्ण उपस्थिति, और दोस्त देशों के साथ एकजुटता जताना है, ताकि समुद्री क्षेत्र में अच्छी व्यवस्था कायम रहे। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत किसी गुट में शामिल ना होने की नीति पर चलता रहा है। ऐसे में वह किसी सैन्य पहल में भाग लेगा, इसकी संभावना कम है।
चीन ने तैनात की हैं परमाणु पनडुब्बियां
जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि चीन दक्षिण चीन सागर को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है। इस क्षेत्र को वह अपना राष्ट्रीय सुरक्षा कवच बताता है। उसने यहां परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां तैनात कर रखी हैं। चीन का दावा है कि उसने ये तैनाती हमला होने पर बचाव के लिए की हैं।
अमेरिका भी बढ़ा रहा मौजूदगी
उधर अमेरिका लगातार इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। इससे इस इलाके में तनाव बढ़ा है। जब ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और भारत ने अपने जहाज यहां तैनात किए, तो उसे उसी पृष्ठभूमि में देखा गया। लेकिन इस तैनाती से यहां का शक्ति संतुलन कितना बदला है, इस सवाल पर इस क्षेत्र के रणनीतिक जानकार सहमत नहीं है। उनमें कुछ से चीन के लिए स्पष्ट संदेश मानते हैं, जबकि कुछ दूसरे विश्लेषकों ने कहा है कि इस बारे में स्पष्टता का अभी अभाव है।