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साइबरस्पेस... जैसा बोया वैसा काटने पर मजबूर हुआ चीन

Fri, 03 Jul 2020 05:56 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
एक दशक पहले जब चीन ने गूगल, फेसबुक और यूट्यूब जैसी नामी कंपनियों पर रोक लगाई थी, तब उसने शायद ही सोचा होगा कि एक दिन ऐसा ही हश्र उसे भी झेलना पड़ेगा। पिछले साल अमेरिका ने 5जी कंपनी हुवावे और अब भारत ने 59 चीनी मोबाइल एप बंद करके ड्रैगन को उसी के अंदाज में सख्त जवाब दिया है। साइबर जानकारों का कहना है कि चीन वर्षों से कई देशों के साथ ऐसा करते आया है। अब उसका वास्तविकता से सामना होने लगा है।

टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म ने व्यापक वैश्विक लोकप्रियता हासिल की। लेकिन चीन के खराब होते कूटनीतिक रिश्तों से ये कंपनियों भी अछूती नहीं रहने वाली। ड्रैगन को आभास होने लगा है कि वह जैसा कर सकता है, वैसा दुनिया को भी उसके साथ करने का अधिकार है। इसकी बड़ी शुरुआत भारत ने कर दी है।
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भारत-चीन कारोबार - फोटो : Amar Ujala
अलीबाबा से लेकर टिकटॉक को हुआ बड़ा नुकसान
भारत के सख्त कदमों से चीन की अलीबाबा, टेंसेंट व बायडू जैसी तकनीकी कंपनियों को झटका लगा है। सबसे ज्यादा नुकसान बाइटडांस की टिकटॉक को होगा। सेंसर टावर के अनुसार प्रतिबंध लगने तक भारत में टिकटॉक के 61 करोड़ यूजर्स हो गए थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : बासित जरगर
सुरक्षा पर कदम उठातीं सरकारें
बढ़ते डिजिटल स्पेस के कारण सुरक्षा को खतरा भी पैदा हुआ है। ऐसे में कई देश कदम उठाने लगे हैं। हाल में यूरोपीय यूनियन ने एपल व गूगल को स्थानीय दिशानिर्देशों का पालन करने को बाध्य किया है।

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भारत और चीन के बीच कारोबार - फोटो : Amar Ujala Graphics
भारत से बाजार छिनना बड़ा झटका
भारत चीन से निर्यात का चार गुना आयात करता है। लेकिन मोदी सरकार ने बीजिंग के लिए खास महत्व केे क्षेत्र पर को सीधी चोट पहुंचाई है। इसकी चीन समेत अन्य देशों में भी काफी चर्चा हो रही है। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश से बाजार छिनना चीनी टेक कंपनियों के लिए बड़ा झटका है।

इन कंपनियों को घर में भी नए यूजर्स नहीं मिल रहे हैं। पश्चिमी देशों में भी कोरोना के बाद चीन के खिलाफ माहौल है। ऐसा नहीं कि भारत ने एक झटके में चीनी एप को बाहर किया है। पिछले साल भी सरकार व कोर्ट इन पर सुरक्षा को लेकर चेताते रहे थे। टिकटॉक को पिछले साल ही पोर्नोग्राफी पर एप स्टोरों से हटा दिया गया था।
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से गले मिलते भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। दूसरी तस्वीर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। - फोटो : Amar Ujala
अमेरिका और यूरोप में भी टूटा जाल बुनने का चीनी सपना
चीनी टेक कंपनियों का अमेरिका व यूरोप में कारोबारी जाल फैलाने का सपना टूट सकता है। कई पश्चिमी देशों में बाइटडांस, कंप्यूटर चिप और एआई कंपनियों के लिए राह आसान नहीं है। अमेरिका स्मार्टफोन और टेलीकॉम उपकरण निर्माता हुवावे को तो जासूसी के शक में बाहर का रास्ता ही दिखा चुका है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इंटरनेट पर मनमानी करता रहा है ड्रैगन
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने विदेशी कंपनियों को इंटरनेट सेवाओं से दूर रखा, ताकि वह देसी कंपनियां खड़ी कर लोगों पर नियंत्रण रख सके और भूराजनीतिक मकसद भी साध सके। चीन विदेशी कंपनियों को अपने यूजर्स तक जितनी पहुंच देता है, उससे ज्यादा वह उन देशों में हासिल कर लेता है।

एनबीए के पदाधिकारी द्वारा हांगकांग के समर्थन में ट्वीट करने के बाद सरकारी चीनी टेलीविजन ने बास्केटबॉल खेलों का प्रसारण ही निरस्त कर दिया था। 2018 में कनाडा में हुवावे के एक कर्मचारी की गिरफ्तारी पर कनाडाई कनोला तेल का लदान ही रोक दिया था। 2010 में नॉर्वे ने चीनी सरकार के आलोचक को नोबेल पुरस्कार दिया तो ड्रैगन ने वहां से मछलियों का आयात रोक दिया था।

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