अमेरिका में टैरिफ को लेकर संवैधानिक बहस और तेज हो गई है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 6-3 के बहुमत से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ को रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि 1977 का अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) राष्ट्रपति को एकतरफा शुल्क लगाने का अधिकार नहीं देता।
नौ सदस्यीय पीठ में से तीन न्यायाधीशों क्लेरेंस थॉमस, सैमुअल ए. एलिटो जूनियर और ब्रेट कैवनॉ ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई। खास बात यह रही कि न्यायमूर्ति कैवनॉ ने अपने असहमति वाले मत में भारत का उल्लेख किया और रूस से तेल आयात के मुद्दे को उदाहरण के तौर पर रखा।
IEEPA पर अदालत की व्याख्या
बहुमत का मानना था कि IEEPA का उद्देश्य आपात स्थितियों में आर्थिक लेनदेन को नियंत्रित करना है, न कि व्यापक आयात शुल्क लगाना। अदालत ने कहा कि अमेरिकी संविधान के तहत कर और शुल्क लगाने की शक्ति मूल रूप से कांग्रेस को प्राप्त है, इसलिए राष्ट्रपति इस कानून का इस्तेमाल कर असीमित टैरिफ नहीं लगा सकते।
हालांकि, न्यायमूर्ति कैवनॉ ने अपने असहमति वाले मत में अलग दृष्टिकोण रखा। उन्होंने लिखा कि विदेशी आयात पर लगाए गए शुल्क ऐतिहासिक रूप से विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े रहे हैं। उनके मुताबिक, इस मामले में IEEPA के तहत लगाए गए शुल्क भी विदेश मामलों से संबंधित थे।
चीन से लेकर जापान तक का जिक्र
कैवनॉ ने कहा कि सरकार के अनुसार राष्ट्रपति ने IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ का उपयोग चीन, यूनाइटेड किंगडम और जापान जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापार वार्ताओं में किया। उन्होंने अपनी राय में लिखा कि इन टैरिफ ने विदेशी बाजारों को अमेरिकी व्यवसायों के लिए अधिक सुलभ बनाने में मदद की और खरबों डॉलर के व्यापार सौदों में योगदान दिया।
भारत और रूस-यूक्रेन संदर्भ
अपने मत में कैवनॉ ने रूस-यूक्रेन संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रपति ने IEEPA अधिकार का उपयोग रूसी संघ और यूक्रेन के बीच जारी संवेदनशील वार्ताओं के संदर्भ में किया। इसी कड़ी में उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि 6 अगस्त 2025 को राष्ट्रपति ने भारत पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल आयात करने के कारण शुल्क लगाया था।
इसके बाद 6 फरवरी 2026 को उन शुल्कों को कम किया गया, क्योंकि सरकार के अनुसार भारत ने रूसी तेल के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात को रोकने की प्रतिबद्धता जताई थी। कैवनॉ के मुताबिक यह कदम विदेश नीति के व्यापक उद्देश्यों से जुड़ा था।
आगे की राह
अदालत का यह फैसला ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि असहमति वाले मत से यह संकेत भी मिलता है कि न्यायपालिका के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद हैं। आने वाले समय में यह मामला राष्ट्रपति और कांग्रेस के अधिकारों की सीमाओं को लेकर और गहरी बहस को जन्म दे सकता है।