अमेरिका की ओर से भारत को ऐसा न्योता क्यों मिला है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिक गई हैं? जब एक तरफ भारत–अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर कड़ी बातचीत चल रही है, और दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप 500 फीसदी टैरिफ की चेतावनी दे चुके हैं, तो ऐसे वक्त में वॉशिंगटन की यह पेशकश क्या संकेत देती है? क्या यह सिर्फ एक बैठक का आमंत्रण है, या फिर बदलती वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की अहमियत को लेकर बड़ा संदेश? ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर अमेरिका क्रिटिकल मिनरल्स पर नई रणनीति क्यों बना रहा है, और इसमें भारत की भूमिका कितनी निर्णायक हो सकती है? क्या यह न्योता चीन पर निर्भरता घटाने की वैश्विक लड़ाई में भारत को एक नए पावर सेंटर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या यह आमंत्रण भारत के लिए अवसर है, सौदे की मेज पर मजबूत स्थिति या नई शर्तों की शुरुआत?
वैश्विक सप्लाई चेन के बढ़ते जोखिमों और चीन पर निर्भरता घटाने की रणनीति के बीच भारत को एक अहम कूटनीतिक संकेत मिला है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि भारत को ग्रुप ऑफ सेवन (G7) के विकसित देशों के वित्त मंत्रियों की एक विशेष बैठक में आमंत्रित किया गया है। यह बैठक सोमवार को वॉशिंगटन में होगी, जिसमें क्रिटिकल मिनरल्स यानी दुर्लभ और रणनीतिक खनिजों पर गहन चर्चा की जाएगी। इस बैठक में G7 देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य गैर-G7 देशों के शामिल होने की भी उम्मीद है।
एक निजी मीडिया चैनल से बातचीत में स्कॉट बेसेंट ने बताया कि वह पिछले साल गर्मियों में हुई G7 नेताओं की बैठक के बाद से ही क्रिटिकल मिनरल्स पर एक केंद्रित चर्चा के लिए जोर दे रहे थे। दिसंबर में इस विषय पर एक वर्चुअल बैठक हो चुकी है, लेकिन वॉशिंगटन में होने वाली यह बैठक कहीं अधिक अहम मानी जा रही है। इसका मकसद सप्लाई चेन से जुड़े खतरों के बीच देशों के बीच समन्वय को और मजबूत करना है।
हालांकि बेसेंट ने यह भी साफ किया कि भारत को न्योता दिया गया है, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नई दिल्ली ने अपनी भागीदारी की पुष्टि की है या नहीं। इसके अलावा किन-किन गैर-G7 देशों को आमंत्रण भेजा गया है, इस पर भी स्थिति साफ नहीं है। G7 में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और यूरोपीय संघ शामिल हैं।
क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर G7 की चिंता की सबसे बड़ी वजह चीन पर भारी निर्भरता है। रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और कॉपर जैसे खनिज आधुनिक रक्षा तकनीकों, सेमीकंडक्टर्स, रिन्यूएबल एनर्जी उपकरणों और बैटरियों के लिए बेहद जरूरी हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक चीन दुनिया के प्रमुख क्रिटिकल मिनरल्स की 47 फीसदी से लेकर 87 फीसदी तक की रिफाइनिंग क्षमता पर नियंत्रण रखता है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इन खनिजों के निर्यात पर सख्ती बढ़ाई है, जिससे पश्चिमी देशों की चिंता और गहरी हो गई है। हाल ही में रिपोर्ट्स सामने आईं कि चीन ने जापानी कंपनियों को रेयर अर्थ और मैग्नेट के निर्यात पर पाबंदियां लगानी शुरू कर दी हैं और जापान की सेना से जुड़े कुछ ड्यूल-यूज सामानों पर भी रोक लगाई है। ऐसे में सोमवार की यह बैठक रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है।
इस बैठक में ऑस्ट्रेलिया की भूमिका भी केंद्र में रहने वाली है। अक्टूबर में ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका के साथ एक अहम समझौता किया था, जिसका मकसद चीन के दबदबे को चुनौती देना है। इसके तहत 8.5 अरब अमेरिकी डॉलर का एक क्रिटिकल मिनरल्स प्रोजेक्ट पाइपलाइन और एक प्रस्तावित रणनीतिक रिजर्व बनाया जा रहा है।
यह रणनीतिक रिजर्व ऐसे समय में दुर्लभ और जरूरी धातुओं जैसे रेयर अर्थ्स और लिथियम की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा, जब वैश्विक बाजार में भारी बाधाएं हों। ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि इस पहल में यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने भी रुचि दिखाई है।
हालांकि अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ा हुआ है, लेकिन स्कॉट बेसेंट ने यह भी कहा कि चीन अभी भी अमेरिका के साथ किए गए अपने कुछ वादों को निभा रहा है। चीन अमेरिकी सोयाबीन की खरीद कर रहा है और अमेरिकी कंपनियों को जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति भी जारी है। यह बयान वैश्विक सप्लाई चेन की उस जटिल हकीकत को दर्शाता है, जिसमें टकराव और निर्भरता दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
अब सवाल ये भी उठता है की भारत के लिए क्यों अहम है यह न्योता?
भारत को मिला यह आमंत्रण उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका को दर्शाता है। विश्लेषकों का मानना है कि G7 देशों और उनके साझेदारों की यह पहल किसी एक देश पर निर्भरता कम करने और सामूहिक आर्थिक व तकनीकी प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।
भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी स्वच्छ ऊर्जा नीति और मैन्युफैक्चरिंग ambitions को पूरा करने के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षित आपूर्ति चाहता है। भारत सरकार ने लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स को रणनीतिक संसाधन घोषित किया है। इसके तहत सरकारी कंपनियों के जरिए विदेशों में खनिज संपत्तियों के अधिग्रहण के प्रयास तेज किए गए हैं, वहीं घरेलू स्तर पर खोज और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
G7 के साथ इस मुद्दे पर सहयोग से भारत को तकनीक, फंडिंग और दीर्घकालिक सप्लाई पार्टनरशिप तक बेहतर पहुंच मिल सकती है। इससे भारत खुद को वैश्विक क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद और वैकल्पिक केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है।