बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। सत्ता के गलियारों में हलचल है, सियासी समीकरण बदल रहे हैं और एक ऐसा नाम तेजी से चर्चा के केंद्र में आ गया है, जो कभी निर्वासन में था, कभी अदालतों के कठघरे में खड़ा था। 17 साल बाद लंदन से लौटे तारिक रहमान अब प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। सवाल सिर्फ उनकी जीत-हार का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या उनकी वापसी बांग्लादेश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत करेगी?
बांग्लादेश का अहम चुनाव
अवामी लीग की गैरमौजूदगी ने इस चुनावी मुकाबले को बिल्कुल नई दिशा दे दी है। शेख हसीना के पद छोड़ने के बाद बने राजनीतिक शून्य ने विपक्ष को बड़ा मौका दिया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी अब सबसे बड़ी और संगठित ताकत के रूप में सामने आई है।
बीएनपी पहले भी सत्ता का स्वाद चख चुकी है, लेकिन इस बार उसका चेहरा हैं तारिक रहमान। पार्टी के भीतर लंबे समय से प्रभावशाली माने जाने वाले तारिक अब खुलकर नेतृत्व की भूमिका में हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी वापसी ने बीएनपी कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है।
कौन हैं तारिक रहमान?
तारिक रहमान राजनीति के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। वे बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं। यानी राजनीति उन्हें विरासत में मिली।
1990 के दशक में उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 2001 से 2007 के बीच बीएनपी सरकार के दौरान वे पार्टी के भीतर बेहद प्रभावशाली बन गए। उस समय उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ के नाम से भी पुकारा गया, क्योंकि माना जाता था कि वे सत्ता के पीछे रहकर रणनीतियां तैयार करते थे।
उनकी छवि एक रणनीतिकार की रही, जो पर्दे के पीछे से पार्टी की दिशा तय करते थे। हालांकि, इसी दौर में उनके खिलाफ कई विवाद भी सामने आए।
निर्वासन और कानूनी चुनौतियां
2007 में सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार के दौरान तारिक रहमान पर भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में आरोप लगे। उन्हें जेल जाना पड़ा। बाद में वे इलाज के लिए लंदन चले गए और वहीं से पार्टी की गतिविधियों को संचालित करते रहे।
2018 और 2021 में उन्हें भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और 2004 के ग्रेनेड हमले से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया गया था। इन मामलों ने उनकी राजनीतिक राह लगभग बंद कर दी थी। लेकिन शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद अदालतों ने उनके खिलाफ कई फैसलों को पलट दिया। इससे उनके देश लौटने और चुनावी राजनीति में सक्रिय होने का रास्ता साफ हो गया।
करीब 17 साल बाद उनकी वापसी को बांग्लादेश की राजनीति की सबसे बड़ी घटनाओं में गिना जा रहा है। उनके समर्थकों के लिए यह “राजनीतिक पुनर्जन्म” है, तो विरोधियों के लिए यह एक नई चुनौती।
पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान की प्रोफाइल
तारिक रहमान की पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान की भी अपनी अलग पहचान है। उनका जन्म 18 मई 1972 को सिलहट में हुआ था। उन्होंने ढाका मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और 1995 में बीसीएस परीक्षा पास कर सरकारी सेवा में शामिल हुईं।
बीसीएस स्वास्थ्य कैडर में उन्होंने प्रथम स्थान हासिल किया था, जो उनकी अकादमिक प्रतिभा को दर्शाता है। 2008 में वे अध्ययन अवकाश पर लंदन गईं, लेकिन बाद में उन्हें सरकारी पद से हटा दिया गया।
लंदन में उन्होंने इंपीरियल कॉलेज से चिकित्सा में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की। उनका परिवार भी प्रभावशाली रहा है। उनके पिता रियर एडमिरल महबूब अली खान बांग्लादेश नौसेना के प्रमुख रहे और बाद में मंत्री भी बने। उनके चाचा जनरल एम.ए.जी. उस्मानी मुक्ति युद्ध के दौरान कमांडर-इन-चीफ थे।
हालांकि, वे भी कानूनी विवादों से अछूती नहीं रहीं। 2008 में भ्रष्टाचार विरोधी आयोग ने उनके, तारिक और उनकी मां के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था। ढाका की अदालत ने उन्हें सजा सुनाई थी, लेकिन अवामी लीग सरकार के पतन के बाद इस सजा पर रोक लगा दी गई।
बेटी जायमा रहमान क्या करती हैं?
तारिक रहमान की बेटी जायमा रहमान करीब 30 साल की हैं। उन्होंने लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की और लिंकन यूनिवर्सिटी से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की।
वे लंदन में प्रैक्टिसिंग बैरिस्टर के तौर पर काम कर चुकी हैं। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद वे बीएनपी की वर्चुअल बैठकों में सक्रिय नजर आई हैं।
जायमा जियाउर रहमान और खालिदा जिया की इकलौती पोती हैं, इसलिए उन्हें पार्टी की अगली पीढ़ी के चेहरे के रूप में भी देखा जा रहा है।
क्या बदलेगा बांग्लादेश का सियासी भविष्य?
तारिक रहमान की वापसी सिर्फ एक व्यक्ति की घर वापसी नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की राजनीति के बदलते दौर का संकेत भी है। अवामी लीग की गैरमौजूदगी में बीएनपी के सामने सत्ता का सुनहरा मौका है। फिलहाल, इतना तय है कि बांग्लादेश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है और इस मोड़ के केंद्र में हैं तारिक रहमान।