पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कहा कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे कभी पद्मविभूषण गिरिजा देवी का सानिध्य मिलेगा। कॉलेज में हुई एक गायन की प्रतियोगिता में वह निर्णायक बनकर आई थीं। प्रतियोगिता में मुझे जब पहला पुरस्कार मिला, उसके बाद बहुत हिम्मत करके मैं उनके पास गई थी। डरते-डरते उनसे पूछा था कि क्या आप मुझे सिखाएंगी? पहले तो उन्होंने अपने खास अंदाज में मुझे देखा था और उसके बाद ठेठ बनारसी अंदाज में कहा था - ठीक हौ, जब बताइब त बनारस आ जाए। वह रविवार को बनारस लिट फेस्ट के तीसरे संस्करण के अंतिम दिन अपनी पुस्तक चंदन किवाड़ पर चर्चा कर रही थीं। रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल के साथ संवाद में पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अपने जीवन के कई ऐसे पहलुओं पर चर्चा की जो आमतौर पर मंच की चमक-दमक में दिखाई नहीं देते। उन्होंने बताया कि कैसे संगीत की ओर रुझान बढ़ाने में उनके परिवार की बड़ी बूढ़ी महिलाओं का सबसे अधिक योगदान रहा। परिवार में समय समय पर होने वाले उत्सवों, विभिन्न मांगलिक कार्यक्रमों और त्योहारों पर होने वाली परंपराओं में गीत कितने महत्वपूर्ण हैं, यह जानने समझने का अवसर भी उन्हीं से मिला। खास अवसर तो छोड़िए हमारी दिनचर्या का कोई ऐसा हिस्सा नहीं जिसके लिए लोक संस्कृति में गीत लिखे और गाये न गए हों। चंदन किवाड़ यह नाम है उस पुस्तक का जिसमें कैद है एक नारी के विस्तार की दास्तान।